खाद्य सुरक्षा विभागों की कार्रवाई और अधिकारियों की छापेमारी से सामने आ रहे मामले; टूथपेस्ट-क्रीम से लेकर घी, मसाले, नमकीन और डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता पर बढ़ी चिंता
नई दिल्ली | फोर्थ पिलर
हालिया घटनाओं, खाद्य सुरक्षा विभागों की कार्रवाइयों तथा मिलावटखोरी के खिलाफ ईमानदारी और सख्ती से कार्रवाई कर रहे अधिकारियों की छापेमारी से मिली जानकारियों ने देश में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अलग-अलग राज्यों में नकली घी, मिलावटी डेयरी उत्पाद, संदिग्ध मसाले, अस्वच्छ खाद्य निर्माण इकाइयों और नकली उपभोक्ता उत्पादों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें सामने आती रही हैं।
इन कार्रवाइयों से एक चिंताजनक तस्वीर सामने आती है—उपभोक्ता बाजार से जिस उत्पाद को असली और सुरक्षित समझकर खरीद रहा है, उसकी गुणवत्ता हमेशा उतनी भरोसेमंद हो, यह जरूरी नहीं।
कहीं नकली घी और तेल के मामले सामने आते हैं, कहीं मसालों में खाद्य मानकों के विपरीत सामग्री मिलाए जाने की जांच होती है, तो कहीं खाद्य निर्माण इकाइयों में स्वच्छता के गंभीर उल्लंघन पाए जाते हैं। डेयरी उत्पादों में मिलावट और नकली खाद्य सामग्री के खिलाफ भी कई स्थानों पर छापेमारी और जब्ती की कार्रवाई की गई है।
इन घटनाओं का सबसे गंभीर पहलू यह है कि मिलावट केवल आर्थिक धोखाधड़ी नहीं है। यदि किसी खाद्य पदार्थ में स्वास्थ्य के लिए अनुपयुक्त या प्रतिबंधित सामग्री मिलाई जाती है, तो उसका सीधा असर आम आदमी और उसके परिवार के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
इसीलिए खाद्य सुरक्षा विभागों की छापेमारी और जांच केवल कारोबारियों पर कार्रवाई का विषय नहीं, बल्कि हर उस उपभोक्ता के अधिकार और स्वास्थ्य का सवाल है जो अपनी मेहनत की कमाई से भोजन खरीदता है।
सोशल मीडिया पर सामने आए कई अलग अलग वीडियो में देश के अलग-अलग हिस्सों में खाद्य एवं उपभोक्ता उत्पादों से संबंधित कई मामलों का उल्लेख करते हुए गंभीर आरोप और खाद्य सुरक्षा कार्रवाई का दावा किया गया है। हालांकि, अलग-अलग मामलों की स्वतंत्र पुष्टि और आधिकारिक जांच के परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी ब्रांड या निर्माता के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष संबंधित खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण की रिपोर्ट के आधार पर ही माना जाना चाहिए।
लेकिन इन दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता के स्वास्थ्य का है।
नकली घी और रिफाइंड ऑयल से लेकर मसालों तक सवाल
सोशल मीडिया के वीडियो में दावा किया गया है कि अयोध्या में बड़ी मात्रा में रिफाइंड ऑयल पकड़ा गया, जबकि सूरत में लगभग 2,000 किलो कथित नकली घी बरामद किए जाने की बात कही गई है।
यदि खाद्य पदार्थों में वास्तविक रूप से निर्धारित मानकों के विपरीत सस्ते तेल, फैट या अन्य औद्योगिक सामग्री मिलाई जाती है, तो यह केवल उपभोक्ता के साथ आर्थिक धोखा नहीं, बल्कि गंभीर स्वास्थ्य जोखिम का विषय बन जाता है।
डेयरी उत्पादों में मिलावट को लेकर भी समय-समय पर खाद्य सुरक्षा एजेंसियां कार्रवाई करती रही हैं। दूध, घी, पनीर और अन्य उत्पादों में वनस्पति तेल, स्टार्च, सिंथेटिक पदार्थ या अन्य गैर-अनुमोदित सामग्री की मिलावट की जांच की जाती है।
मसालों में टैल्कम पाउडर और सिंथेटिक रंगों के दावे
मिलावट की सबसे चिंताजनक तस्वीर मसालों को लेकर सामने आती है।
सोशल मीडिया के वीडियो में दावा किया गया है कि जीरा, अजवाइन, लौंग और सौंफ जैसे मसालों में टैल्कम पाउडर, फैब्रिक डाई, औद्योगिक रंग और सिंथेटिक कलर जैसी सामग्री मिलाए जाने के मामले सामने आए हैं।
मसाले भारतीय भोजन का रोजमर्रा का हिस्सा हैं। ऐसे में यदि किसी उत्पाद में खाद्य उपयोग के लिए अनुमत नहीं किए गए रंग या रसायन पाए जाते हैं, तो यह खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है।
यहां उपभोक्ताओं के लिए भी जरूरी है कि खुले और बिना लेबल वाले मसालों के बजाय विश्वसनीय स्रोत से पैक्ड उत्पाद खरीदें तथा पैकेट पर FSSAI लाइसेंस नंबर, निर्माण तिथि, बैच नंबर और सामग्री की जानकारी अवश्य देखें।
सिर्फ खाद्य पदार्थ ही नहीं, कॉस्मेटिक्स और टूथपेस्ट भी सवालों के घेरे में
सोशल मीडिया के वीडियो में दिल्ली में कथित तौर पर नकली टूथपेस्ट और क्रीम तैयार किए जाने का भी उल्लेख किया गया है।
कॉस्मेटिक और व्यक्तिगत उपयोग के उत्पादों में नकली सामग्री का इस्तेमाल भी गंभीर विषय है। टूथपेस्ट, क्रीम और अन्य उत्पाद सीधे शरीर के संपर्क में आते हैं। ऐसे में नकली उत्पादों की बिक्री उपभोक्ता के स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
इस तरह के मामलों में उपभोक्ताओं को केवल कम कीमत देखकर उत्पाद खरीदने के बजाय उसके पैकेजिंग, निर्माता, लाइसेंस, बैच नंबर और प्रमाणिकता की जांच करनी चाहिए।
पैकेज्ड फूड और नमकीन उत्पादों की स्वच्छता पर भी सवाल
सोशल मीडिया के वीडियो में कुछ खाद्य ब्रांडों और खाद्य प्रतिष्ठानों के संबंध में लाइसेंस रद्द किए जाने अथवा खाद्य सुरक्षा कार्रवाई का दावा किया गया है। इनमें ड्राई फ्रूट्स और नमकीन से जुड़े कुछ नामों का भी उल्लेख है।
विशेष रूप से खाद्य निर्माण इकाइयों में चूहे, चूहे की बीट, कीड़े या छिपकली जैसे जीव पाए जाने की स्थिति को गंभीर स्वच्छता उल्लंघन माना जाता है।
यदि किसी फैक्ट्री में इस प्रकार की परिस्थितियां आधिकारिक निरीक्षण में प्रमाणित होती हैं, तो सवाल सिर्फ उत्पाद की गुणवत्ता का नहीं रहता, बल्कि पूरी उत्पादन प्रक्रिया और खाद्य सुरक्षा प्रणाली की निगरानी का बन जाता है।
ब्रोमेट और स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता
सोशल मीडिया के वीडियो में एक लोकप्रिय घरेलू उत्पाद में निर्धारित सीमा से अधिक ब्रोमेट पाए जाने का दावा किया गया है और इसे डीएनए क्षति तथा कैंसर के संभावित खतरे से जोड़ा गया है।
हालांकि इस प्रकार के दावे को किसी विशिष्ट उत्पाद के संबंध में सही मानने से पहले प्रयोगशाला जांच, नमूने की रिपोर्ट और संबंधित नियामक संस्था के आधिकारिक निष्कर्ष देखना आवश्यक है।
यही कारण है कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों में सोशल मीडिया पर वायरल दावे और वैज्ञानिक/सरकारी जांच के निष्कर्षों के बीच अंतर करना बेहद जरूरी है।
फलों और सब्जियों में कीटनाशकों का सवाल
मिलावट का दायरा केवल पैकेज्ड खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं है। फल और सब्जियों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों को लेकर भी उपभोक्ताओं के बीच चिंता बनी रहती है।
सोशल मीडिया के वीडियो में विशेष रूप से अंगूर, स्ट्रॉबेरी और सेब में कीटनाशक अवशेषों की बात कही गई है।
यहां यह समझना जरूरी है कि किसी फल पर कीटनाशक का इस्तेमाल होना अपने आप में उसे जहरीला सिद्ध नहीं करता। असली सवाल है कि उसमें मौजूद pesticide residue निर्धारित अधिकतम अवशेष सीमा (MRL) के भीतर है या नहीं।
फल-सब्जियों को बहते पानी में अच्छी तरह धोना जरूरी है। केवल बेकिंग सोडा या किसी घरेलू उपाय से हर प्रकार के रासायनिक अवशेष पूरी तरह हट जाने की गारंटी नहीं होती।
डेयरी कारोबार में बड़ी कार्रवाई का दावा
सोशल मीडिया के वीडियो में उत्तर प्रदेश में खाद्य सुरक्षा से जुड़ी बड़ी कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया है। इसमें आईएएस अधिकारी रोशन जैकब के नेतृत्व में बड़ी संख्या में छापेमारी किए जाने तथा लगभग 11 करोड़ रुपये के खाद्य उत्पाद जब्त किए जाने का दावा किया गया है।
वीडियो के अनुसार डेयरी उत्पादों में रिफाइंड ऑयल, फैट, सोयाबीन आधारित सामग्री, डिटर्जेंट, टैल्कम पाउडर अथवा अन्य संदिग्ध पदार्थों की मिलावट की जांच की गई और कथित तौर पर मानकों के विपरीत पाए गए उत्पादों को नष्ट करने के निर्देश दिए गए।
इन आंकड़ों और प्रत्येक कार्रवाई की पुष्टि संबंधित विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड से किया जाना जरूरी है, लेकिन यदि इस स्तर पर मिलावट वास्तव में पकड़ी गई है तो यह खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर संकेत है।
सबसे बड़ा सवाल—उपभोक्ता आखिर भरोसा करे तो किस पर?
आज का उपभोक्ता पैकेट देखकर उत्पाद खरीदता है।
वह ब्रांड देखता है, कीमत देखता है, पैकिंग देखता है और यह मानकर घर ले जाता है कि बाजार में बिक रहा सामान निर्धारित मानकों के अनुरूप होगा।
लेकिन यदि जांच में कहीं नकली घी, कहीं मिलावटी दूध, कहीं संदिग्ध मसाले, कहीं अस्वच्छ फैक्ट्री और कहीं नकली कॉस्मेटिक्स सामने आते हैं, तो सवाल केवल दुकानदार पर नहीं उठता।
सवाल पूरी सप्लाई चेन और नियामक व्यवस्था पर भी उठता है।
मुनाफे की भूख बनाम इंसान की जिंदगी
खाद्य पदार्थों में मिलावट का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसका शिकार किसी एक वर्ग का व्यक्ति नहीं होता।
गरीब हो या अमीर, गांव में रहने वाला हो या महानगर में—हर व्यक्ति रोजाना बाजार से दूध, तेल, मसाले, नमकीन, फल और अन्य खाद्य सामग्री खरीदता है।
मिलावटखोर के लिए यह सिर्फ मुनाफे का खेल हो सकता है, लेकिन उपभोक्ता के लिए यह उसके परिवार की सेहत का सवाल है।
कुछ रुपये बचाने या ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए यदि किसी खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता से समझौता किया जाता है तो उसकी कीमत आखिर कौन चुकाता है?
सरकार और खाद्य सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती
खाद्य सुरक्षा केवल छापेमारी तक सीमित नहीं रह सकती। जरूरी है कि—
- संदिग्ध खाद्य उत्पादों की नियमित और वैज्ञानिक जांच हो।
- मिलावट पाए जाने पर कार्रवाई तेज और पारदर्शी हो।
- दोषी निर्माताओं और सप्लायरों की जवाबदेही तय हो।
- जब्त उत्पादों की जानकारी सार्वजनिक की जाए।
- ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले खाद्य उत्पादों की भी नियमित निगरानी हो।
- उपभोक्ताओं को नकली और असली उत्पाद की पहचान के बारे में जागरूक किया जाए।
- खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाई जाए।
मंगल पर जीवन की तलाश से पहले धरती पर शुद्ध भोजन की गारंटी जरूरी
भारत विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है। अंतरिक्ष में मिशन भेजे जा रहे हैं, नई तकनीक विकसित हो रही है और मंगल ग्रह पर जीवन की संभावनाओं पर शोध किया जा रहा है।
लेकिन दूसरी तरफ यदि आम आदमी को शुद्ध दूध, असली घी, सुरक्षित मसाले और मानकों के अनुरूप खाद्य पदार्थ मिलने को लेकर ही आशंकित रहना पड़े, तो यह व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल है।
विकास का वास्तविक अर्थ तभी है जब देश का नागरिक जो पैसा देकर बाजार से भोजन खरीदता है, उसे यह भरोसा भी हो कि उसकी थाली में पहुंचने वाला भोजन सुरक्षित है।
फोर्थ पिलर की टिप्पणी
मिलावट के किसी भी मामले में बिना आधिकारिक जांच के किसी व्यक्ति या ब्रांड को दोषी ठहराना उचित नहीं है। लेकिन जहां खाद्य सुरक्षा एजेंसियों की जांच में अनियमितता प्रमाणित होती है, वहां कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उपभोक्ता का स्वास्थ्य किसी भी कारोबारी मुनाफे से बड़ा है।
— शेख करीम
प्रधान संपादक, फोर्थ पिलर








