जौहर विश्वविद्यालय को लेकर सियासत के बीच योगी आदित्यनाथ के बयान पर बहस; मौलाना मोहम्मद अली जौहर की मृत्यु 1931 में, जबकि पाकिस्तान की मांग का औपचारिक राजनीतिक प्रस्ताव 1940 में सामने आया
रायपुर छत्तीसगढ़।
रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से विवाद जारी है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान से जुड़े इस विश्वविद्यालय और उससे संबंधित विभिन्न कानूनी एवं प्रशासनिक कार्रवाइयों के बीच अब बहस का एक नया केंद्र इतिहास और मौलाना मोहम्मद अली जौहर की राजनीतिक भूमिका बन गया है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा मौलाना अली जौहर को भारत की आजादी और देश के विभाजन के संदर्भ में जिम्मेदार ठहराए जाने संबंधी बयान ने इतिहास को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है। इस दावे की पड़ताल करते समय सबसे पहले घटनाओं की कालक्रमवार स्थिति समझना जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य—मौलाना मोहम्मद अली जौहर का निधन 1931 में हुआ
मौलाना मोहम्मद अली जौहर का जन्म 10 दिसंबर 1878 को रामपुर रियासत में हुआ था और उनका निधन 4 जनवरी 1931 को लंदन में हुआ।
वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख मुस्लिम नेताओं में शामिल थे। वे पत्रकार, लेखक, राजनीतिक कार्यकर्ता और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे।
इसलिए यह तथ्य निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण है कि मौलाना अली जौहर की मृत्यु 1931 में हो चुकी थी।
दूसरी ओर, भारतीय मुस्लिम लीग ने लाहौर प्रस्ताव 23 मार्च 1940 को पारित किया, जिसे बाद में पाकिस्तान की मांग के राजनीतिक आधार के रूप में देखा गया। अर्थात मौलाना जौहर की मृत्यु और मुस्लिम लीग के 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बीच लगभग नौ वर्ष का अंतर है।
इस आधार पर किसी व्यक्ति को सीधे तौर पर 1940 के लाहौर प्रस्ताव के लिए जिम्मेदार ठहराना ऐतिहासिक रूप से सावधानी की मांग करता है।
लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी समझना जरूरी है
यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि 1931 से पहले भारत के भविष्य, हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व अथवा अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं को लेकर कोई चर्चा ही नहीं हुई थी।
1920 और 1930 के दशक में भारतीय राजनीति में अलग निर्वाचन क्षेत्र, मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक सुधार और हिंदू-मुस्लिम संबंधों को लेकर तीखी बहस चल रही थी।
1928 की नेहरू रिपोर्ट और उसके जवाब में 1929 में मोहम्मद अली जिन्ना के 14 सूत्र इसी व्यापक संवैधानिक विवाद की महत्वपूर्ण कड़ियां थीं।
हालांकि उस समय तक 1940 के लाहौर प्रस्ताव के रूप में पाकिस्तान की औपचारिक मांग सामने नहीं आई थी।
इसलिए इतिहास को दो चरम सीमाओं में देखना उचित नहीं होगा—न तो यह कहना सटीक है कि जौहर का विभाजन संबंधी राजनीतिक विमर्श से कोई संबंध ही नहीं था, और न ही यह कहना ऐतिहासिक रूप से उचित प्रतीत होता है कि वे 1940 के पाकिस्तान प्रस्ताव के प्रत्यक्ष जिम्मेदार थे।
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कौन थे मौलाना मोहम्मद अली जौहर?
मौलाना मोहम्मद अली जौहर केवल एक राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे। वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय राजनीतिक आंदोलन के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल थे।
उन्होंने अपने भाई मौलाना शौकत अली के साथ खिलाफत आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों भाइयों को भारतीय इतिहास में अली बंधुओं के नाम से जाना जाता है।
मोहम्मद अली जौहर ने पत्रकारिता के माध्यम से भी ब्रिटिश शासन की नीतियों का विरोध किया। उन्होंने ‘कॉमरेड’ और ‘हमदर्द’ जैसे प्रकाशनों के माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बात रखी।
वे महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले असहयोग आंदोलन से भी जुड़े और ब्रिटिश शासन के खिलाफ सक्रिय राजनीतिक आंदोलन के कारण जेल भी गए।
गोलमेज सम्मेलन में भी उठाई भारत की स्वतंत्रता की मांग
मोहम्मद अली जौहर 1930 में लंदन में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भी शामिल हुए।
उनका स्वास्थ्य उस समय खराब था, लेकिन उन्होंने भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रश्न को मजबूती से उठाया।
उनकी मृत्यु भी लंदन में हुई और उन्हें यरुशलम में दफनाया गया।
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‘पाकिस्तान’ शब्द और जौहर की मृत्यु—कालक्रम क्या बताता है?
इस बहस में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है।
‘Pakistan’ नाम को 1933 में चौधरी रहमत अली और उनके साथियों द्वारा प्रकाशित एक पैम्फलेट ‘Now or Never’ के माध्यम से राजनीतिक रूप से प्रस्तुत किया गया।
मोहम्मद अली जौहर का निधन 1931 में हो चुका था।
इसलिए यह कहना कि जौहर ने 1933 में सामने आए ‘Pakistan’ नाम या 1940 के लाहौर प्रस्ताव को प्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़ाया था, कालक्रम की दृष्टि से संभव नहीं है।
हालांकि इससे यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता कि जौहर के राजनीतिक विचारों और बाद में विकसित हुई मुस्लिम पृथकतावादी राजनीति के बीच कोई वैचारिक संबंध खोजा ही नहीं जा सकता। इतिहास में किसी नेता के विचारों का बाद की राजनीतिक घटनाओं पर प्रभाव अलग प्रश्न है और किसी विशेष घटना के लिए प्रत्यक्ष जिम्मेदारी अलग।
यही अंतर राजनीतिक बहस में अक्सर गायब हो जाता है।
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रामपुर का जौहर विश्वविद्यालय और आजम खान
रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय का नाम मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखा गया है। विश्वविद्यालय की स्थापना समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान से जुड़ी रही है।
विश्वविद्यालय लंबे समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति में विवाद का विषय रहा है। विश्वविद्यालय की जमीन, प्रशासनिक अनुमति, निर्माण और अन्य मामलों को लेकर विभिन्न स्तरों पर कानूनी एवं सरकारी कार्रवाई होती रही है।
आजम खान और उनके परिवार से जुड़े मामलों में प्रवर्तन निदेशालय (ED) समेत विभिन्न सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई भी चर्चा में रही है।
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी विश्वविद्यालय या उसके संस्थापक के खिलाफ कानूनी/प्रशासनिक कार्रवाई और उस विश्वविद्यालय के नाम पर रखे गए ऐतिहासिक व्यक्तित्व के विचारों को एक ही विषय मान लेना उचित नहीं होगा।
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फैक्ट-चेक: क्या मौलाना जौहर को ‘भारत विभाजन का जिम्मेदार’ कहना ऐतिहासिक रूप से सही है?
निष्कर्ष: दावा अत्यधिक सरलीकृत है।
दावा ऐतिहासिक स्थिति
मौलाना मोहम्मद अली जौहर का निधन 1931 में हुआ सही
1940 का लाहौर प्रस्ताव उनके निधन के बाद आया सही
पाकिस्तान नाम का राजनीतिक इस्तेमाल 1933 में रहमत अली के पैम्फलेट में हुआ सही
जौहर का मुस्लिम राजनीति और खिलाफत आंदोलन से संबंध था सही
वे हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक प्रश्नों और मुस्लिम प्रतिनिधित्व की राजनीति में सक्रिय थे सही
उन्हें सीधे 1940 के पाकिस्तान प्रस्ताव का जिम्मेदार कहना ऐतिहासिक रूप से अतिसरलीकरण
जौहर के राजनीतिक विचारों को बाद की मुस्लिम राजनीति से जोड़कर देखना अलग ऐतिहासिक बहस का विषय
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इतिहास को चुनावी राजनीति से अलग पढ़ने की जरूरत
मौलाना मोहम्मद अली जौहर को लेकर आज की राजनीतिक बहस में दो बातें अलग-अलग रखना बेहद जरूरी है।
पहली—जौहर के वास्तविक राजनीतिक विचार क्या थे?
और दूसरी—क्या 1940 के बाद सामने आए पाकिस्तान के राजनीतिक प्रस्ताव के लिए उन्हें सीधे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
पहले प्रश्न का उत्तर उनके लेखन, भाषणों और राजनीतिक गतिविधियों से खोजा जाना चाहिए, जबकि दूसरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए घटनाओं का कालक्रम देखना होगा।
जौहर की मृत्यु 1931 में हो चुकी थी। मुस्लिम लीग का लाहौर प्रस्ताव 1940 में आया। पाकिस्तान शब्द का राजनीतिक प्रस्ताव 1933 में सामने आया।
इसलिए इतिहास को एक राजनीतिक नारे में समेटने के बजाय तारीखों, दस्तावेजों और मूल स्रोतों के आधार पर देखना ज्यादा उचित होगा।
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फोर्थ पिलर की संपादकीय टिप्पणी
आज की राजनीति में इतिहास लगातार राजनीतिक बहस का हथियार बनता जा रहा है। किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आलोचना तथ्यों और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित होनी चाहिए।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर के राजनीतिक विचारों पर गंभीर बहस हो सकती है। उनके खिलाफ आलोचनात्मक तथ्य भी सामने रखे जा सकते हैं। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को किसी ऐतिहासिक घटना का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, तो यह देखना जरूरी है कि वह घटना कब हुई और संबंधित व्यक्ति उस समय जीवित भी था या नहीं।
मौलाना जौहर 1931 में दुनिया से चले गए थे। पाकिस्तान की मांग का औपचारिक राजनीतिक स्वरूप 1940 के लाहौर प्रस्ताव में सामने आया।
इसलिए जौहर को सीधे भारत विभाजन का जिम्मेदार बताने से पहले इतिहास के पूरे कालक्रम को सामने रखना जरूरी है।
राजनीतिक बयान आते-जाते रहेंगे, लेकिन इतिहास की किताबें तारीखों और दस्तावेजों के आधार पर ही लिखी जाती हैं।
— शेख करीम
प्रधान संपादक, फोर्थ पिलर (4thPILLER)








