राजकोषीय अनुशासन के सूचकांक में बड़ी गिरावट, 56 से घटकर 7.4 अंक पर पहुंचा स्कोर; 2023-24 में राजकोषीय घाटा GSDP का 5.32 प्रतिशत
रायपुर। फोर्थ पिलर डेस्क |
अब्दुल शेख करीम, प्रधान संपादक
छत्तीसगढ़ में महिलाओं को हर महीने महतारी वंदन योजना के तहत ₹1,000 की आर्थिक सहायता दी जा रही है। किसानों के लिए धान की कीमत ₹3,100 प्रति क्विंटल का मुद्दा भी राज्य की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार इन योजनाओं को जनकल्याण और आर्थिक राहत के तौर पर प्रस्तुत करती है।
लेकिन इन योजनाओं और बढ़ते सरकारी खर्च के बीच छत्तीसगढ़ की राजकोषीय स्थिति और वित्तीय अनुशासन को लेकर नीति आयोग के आंकड़ों ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है।
नीति आयोग के Fiscal Health Index में 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ के राजकोषीय अनुशासन का स्कोर 2022-23 के 56 अंक से घटकर महज 7.4 अंक रह गया। राजकोषीय अनुशासन के इस पैमाने पर राज्य का प्रदर्शन 18 बड़े राज्यों में बेहद नीचे रहा।
यह गिरावट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की राजस्व प्राप्तियों में उल्लेखनीय वृद्धि होने के बावजूद सरकारी खर्च में भी तेज बढ़ोतरी हुई है।
राजस्व बढ़ा, लेकिन खर्च ने बढ़ा दिया घाटा
नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2019-20 से 2023-24 के बीच छत्तीसगढ़ की राजस्व प्राप्तियों में 62.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
इस दौरान राज्य की अपनी राजस्व प्राप्तियों का हिस्सा भी 37 प्रतिशत से बढ़कर 52 प्रतिशत हुआ।
कर संग्रह की क्षमता में भी सुधार दर्ज किया गया। यानी राज्य की अपनी आय जुटाने की क्षमता में सकारात्मक बदलाव आया।
लेकिन दूसरी तरफ इसी अवधि में राज्य का कुल खर्च करीब 58.92 प्रतिशत बढ़ गया।
यहीं से छत्तीसगढ़ की वित्तीय स्थिति का महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—
जब राज्य की आय बढ़ रही है, तो राजकोषीय घाटा इतना क्यों बढ़ रहा है?
राजकोषीय घाटा 5.32%, लक्ष्य था 2.9%
वित्त वर्ष 2023-24 में छत्तीसगढ़ का राजकोषीय घाटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 5.32 प्रतिशत रहा।
वहीं निर्धारित लक्ष्य करीब 2.9 प्रतिशत था।
यानी वास्तविक राजकोषीय घाटा सरकार के निर्धारित लक्ष्य से काफी ऊपर रहा।
राजकोषीय घाटा बढ़ने का सीधा अर्थ यह नहीं है कि कोई राज्य तत्काल आर्थिक संकट में पहुंच गया है। लेकिन लगातार ऊंचा घाटा सरकार की वित्तीय गुंजाइश पर दबाव जरूर डाल सकता है।
यही कारण है कि नीति आयोग के आंकड़ों में राजस्व जुटाने की क्षमता में सुधार के साथ-साथ राजकोषीय अनुशासन में आई गिरावट विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है।
महतारी वंदन से कृषि सब्सिडी तक बढ़ रहा प्रतिबद्ध खर्च

राज्य के खर्च में कई ऐसी योजनाएं और मद शामिल हैं जिनका वित्तीय भार लगातार जारी रहता है।
इनमें—
- महतारी वंदन योजना
- कृषि उन्नति योजना
- कृषि बिजली सब्सिडी
- पेंशन व्यय
- प्रधानमंत्री आवास योजना
- समग्र शिक्षा
- किसानों से जुड़ी सहायता योजनाएं
जैसी मदें शामिल हैं।
नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2019-20 से 2023-24 के बीच छत्तीसगढ़ का प्रतिबद्ध खर्च 18.1 प्रतिशत बढ़ा।
प्रतिबद्ध खर्च वह व्यय है जिसे सरकार के लिए अचानक कम करना आसान नहीं होता। वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और कई नियमित योजनाओं का खर्च आने वाले वर्षों के बजट पर भी असर डालता है।
आज की योजना, कल का वित्तीय बोझ?
यहीं से छत्तीसगढ़ की आर्थिक नीति को लेकर सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है।
यदि सरकार की आय लगातार बढ़ती है तो कल्याणकारी योजनाओं के लिए संसाधन उपलब्ध कराना अपेक्षाकृत आसान रहता है। लेकिन यदि योजनाओं और प्रतिबद्ध खर्च की वृद्धि राजस्व वृद्धि की बराबरी या उससे अधिक गति से होने लगे, तो भविष्य में विकास कार्यों के लिए उपलब्ध राशि पर दबाव बढ़ सकता है।
इसका असर नई—
सड़क, सिंचाई, अस्पताल, स्कूल, औद्योगिक अधोसंरचना, बिजली और रोजगार परियोजनाओं
पर पड़ सकता है।
सरकार के सामने चुनौती यही है कि कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ पूंजीगत और विकासात्मक खर्च के लिए भी पर्याप्त वित्तीय स्थान बचा रहे।
क्या छत्तीसगढ़ आर्थिक संकट में है?
यह कहना फिलहाल उचित नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ आर्थिक रूप से दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच गया है।
दरअसल, नीति आयोग के आंकड़े राज्य की वित्तीय स्थिति का दूसरा और सकारात्मक पक्ष भी सामने रखते हैं।
राज्य की राजस्व जुटाने की क्षमता, खर्च की गुणवत्ता और कर्ज प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन अपेक्षाकृत मजबूत रहा है।
समग्र वित्तीय स्वास्थ्य के सूचकांक में भी छत्तीसगढ़ कई राज्यों से बेहतर स्थिति में दिखाई देता है।
यानी तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है।
छत्तीसगढ़ की समस्या आय पैदा करने की क्षमता से ज्यादा राजकोषीय अनुशासन और खर्च के बढ़ते दबाव की है।
कर्ज और ब्याज भुगतान भी महत्वपूर्ण संकेतक
वित्तीय स्थिति का आकलन केवल राजकोषीय घाटे से नहीं किया जा सकता। राज्य पर कुल देनदारियां और उस कर्ज पर होने वाला ब्याज भुगतान भी महत्वपूर्ण होता है।
नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में छत्तीसगढ़ की कुल बकाया देनदारियां GSDP की करीब 24.93 प्रतिशत थीं।
वहीं 2019-20 की तुलना में ब्याज भुगतान में 36.78 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
इसका अर्थ यह है कि राज्य पर कर्ज का दबाव अभी नियंत्रण से बाहर नहीं है, लेकिन ब्याज भुगतान में वृद्धि भविष्य के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
कर्ज लेकर विकासात्मक परिसंपत्तियां तैयार करना और कर्ज लेकर लगातार राजस्व खर्च पूरा करना—इन दोनों के आर्थिक परिणाम अलग-अलग होते हैं।
ओडिशा से तुलना भी महत्वपूर्ण
नीति आयोग के Fiscal Health Index में ओडिशा 73.1 अंक के साथ शीर्ष स्थान पर रहा।
ओडिशा की वित्तीय स्थिति में बेहतर राजस्व क्षमता, नियंत्रित राजकोषीय घाटा, पूंजीगत खर्च और कर्ज प्रबंधन जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण माना गया है।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य हैं। ऐसे में यह तुलना महत्वपूर्ण हो जाती है कि प्राकृतिक संसाधनों और सरकारी राजस्व से प्राप्त धन का उपयोग किस तरह किया जा रहा है।
यदि संसाधनों से प्राप्त आय का बड़ा हिस्सा केवल तत्काल उपभोग या राजस्व खर्च में चला जाए तो उसका प्रभाव सीमित अवधि तक रहता है।
इसके विपरीत यदि यही धन—
उद्योग, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और अन्य उत्पादक बुनियादी ढांचे
पर खर्च किया जाए तो भविष्य में अतिरिक्त आर्थिक गतिविधि और राजस्व पैदा करने की क्षमता विकसित हो सकती है।
महतारी वंदन और किसानों की सहायता पर सवाल नहीं, वित्तीय मॉडल पर सवाल
कल्याणकारी योजनाओं को केवल इसलिए गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि उन पर सरकारी पैसा खर्च हो रहा है।
महिलाओं को आर्थिक सहायता देना, किसानों को बेहतर कीमत उपलब्ध कराना और कमजोर वर्गों को सामाजिक सुरक्षा देना सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल है।
लेकिन आर्थिक नीति का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सवाल यह है कि—
क्या इन योजनाओं को लंबे समय तक वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाया जा सकता है?
क्या महिलाओं को मिलने वाली सहायता को रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ा जा सकता है?
क्या किसानों को बेहतर कीमत के साथ कृषि उत्पादकता और बाजार आधारित आय बढ़ाने के अवसर दिए जा सकते हैं?
क्या सब्सिडी के साथ ऐसी नीतियां बनाई जा सकती हैं जिससे भविष्य में सरकारी सहायता पर निर्भरता कम हो?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या सरकार नई योजनाओं के साथ उनके अगले 5, 10 और 15 वर्षों के वित्तीय भार का भी आकलन सार्वजनिक करेगी?
राजनीतिक लोकप्रियता और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन जरूरी
किसी भी सरकार के लिए जनता को तत्काल राहत देना राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है।
लेकिन सरकार की जिम्मेदारी केवल वर्तमान की जरूरतें पूरी करना नहीं, बल्कि भविष्य की वित्तीय क्षमता सुरक्षित रखना भी है।
आज महिलाओं के खाते में ₹1,000 पहुंच रहे हैं।
आज किसान को ₹3,100 प्रति क्विंटल की उम्मीद और समर्थन मिल रहा है।
लेकिन आने वाले वर्षों में राज्य को नई सड़कें बनानी हैं, सिंचाई परियोजनाएं पूरी करनी हैं, अस्पताल और स्कूल विकसित करने हैं, उद्योगों को आकर्षित करना है और रोजगार के अवसर पैदा करने हैं।
इन सभी के लिए सरकार के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन होना जरूरी है।
इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि जनकल्याण बनाम विकास में से क्या चुना जाए।
बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि—
जनकल्याण और दीर्घकालीन विकास दोनों को वित्तीय रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए?
फोर्थ पिलर का संपादकीय सवाल
नीति आयोग के आंकड़े छत्तीसगढ़ के लिए तत्काल आर्थिक तबाही की घोषणा नहीं करते, लेकिन राजकोषीय अनुशासन में 56 से 7.4 अंक की गिरावट, 5.32 प्रतिशत का राजकोषीय घाटा, बढ़ता प्रतिबद्ध खर्च और बढ़ता ब्याज भुगतान सरकार तथा नीति-निर्माताओं के लिए गंभीर संकेत जरूर हैं।
छत्तीसगढ़ के पास राहत की कई वजहें भी हैं—राजस्व जुटाने की क्षमता में सुधार हुआ है, राज्य की अर्थव्यवस्था में संभावनाएं हैं और वित्तीय स्थिति अभी कई राज्यों की तुलना में संभली हुई है।
लेकिन यही स्थिति सरकार को समय रहते सावधान होने का अवसर भी देती है।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि आज की लोकप्रिय योजनाओं का वित्तीय बोझ कल के विकास को कमजोर न कर दे।
क्योंकि किसी राज्य की आर्थिक मजबूती केवल इस बात से तय नहीं होती कि सरकार ने जनता को कितना पैसा दिया।
असल कसौटी यह भी है कि—
सरकार ने कितना कमाया, कितना खर्च किया, कितना कर्ज लिया और आने वाली पीढ़ी के लिए कितनी वित्तीय क्षमता छोड़ी।
फोर्थ पिलर का मानना है कि छत्तीसगढ़ में अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर इसी सवाल पर गंभीर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए।
अब्दुल शेख करीम
प्रधान संपादक, फोर्थ पिलर
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