जोह्रान ममदानी बोले—बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष भारत की जिस तस्वीर के साथ मैं बड़ा हुआ, उसमें हर व्यक्ति की बराबर हिस्सेदारी थी; RSS की कथित बहिष्कारी विचारधारा का विरोध करता हूं
नई दिल्ली | फोर्थ पिलर न्यूज़ नेटवर्क
प्रधान संपादक : शेख करीम
अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित मैडिसन स्क्वेयर गार्डन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर भारत और अमेरिका की राजनीति में बहस तेज हो गई है। इस विवाद की शुरुआत तब हुई, जब न्यूयॉर्क के मेयर जोह्रान ममदानी ने RSS की विचारधारा को लेकर अपनी असहमति सार्वजनिक रूप से जाहिर की और कहा कि वे इस कार्यक्रम का समर्थन नहीं करते।
हालांकि, ममदानी ने यह भी स्पष्ट किया कि मैडिसन स्क्वेयर गार्डन एक निजी स्थल है और किसी निजी कार्यक्रम को रद्द करने के अधिकार क्षेत्र को लेकर शहर की सीमाएं हैं। यानी विरोध जताने और कार्यक्रम रद्द कराने के अधिकार में अंतर है।
यही बिंदु अब भारत में छिड़ी राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।
“मैं इस रैली का समर्थन नहीं करता, लेकिन इसे रद्द करने का अधिकार मेरे पास नहीं”
जोह्रान ममदानी ने अपने बयान में भारत से अपने पारिवारिक जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी मां का परिवार आज भी भारत में रहता है। उन्होंने कहा कि जिस भारत के बारे में उन्होंने अपने परिवार से जाना और जिस भारत को देखते हुए वे बड़े हुए, वह बहुलतावादी समाज और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य था, जहां प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान स्थान की कल्पना थी।
ममदानी ने कहा कि किसी भी देश के बारे में ऐसी विचारधारा का उभरना, जिसमें कुछ लोगों को बाहर रखने की बात हो, उनके लिए बेहद चिंताजनक है। उन्होंने ऐसी सोच का विरोध करने की बात कही।
हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि क्या मैडिसन स्क्वेयर गार्डन में होने वाली RSS की रैली को रद्द किया जाना चाहिए, तो उन्होंने साफ कहा कि वे रैली का समर्थन नहीं करते, लेकिन यह निजी आयोजन है और उन्हें नहीं पता कि इसे रद्द करने का कानूनी अधिकार शहर के पास है या नहीं।
यही बात इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण पहलू बन गई है—राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन निजी स्थल पर होने वाले कार्यक्रम को रद्द करने की प्रशासनिक शक्ति अलग प्रश्न है।
भारत में उठे सवाल—क्या किसी निर्वाचित मेयर को निजी कार्यक्रम रद्द करने का अधिकार है?
ममदानी के बयान के बाद भारत में भाजपा और कांग्रेस समेत विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।
भाजपा की ओर से सवाल उठाया गया कि न्यूयॉर्क के मेयर को RSS के कार्यक्रम पर टिप्पणी करने का अधिकार आखिर किस आधार पर है। वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी आवाजों ने RSS की विचारधारा, उसके इतिहास और संगठनात्मक पारदर्शिता को लेकर पुराने सवाल फिर सामने रखे हैं।
इस विवाद में स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने भी व्यंग्य के जरिए भारत और अमेरिका की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की तुलना की। उन्होंने अपने अनुभवों और भारत में कार्यक्रमों को लेकर सामने आए विवादों का हवाला देते हुए तंज किया कि भारत में किसी निजी कार्यक्रम को रोकने के लिए कभी-कभी प्रशासनिक स्तर पर दबाव या सुरक्षा संबंधी कारण सामने आ सकते हैं।
कामरा ने व्यंग्यात्मक अंदाज में यह भी बताया कि किस तरह किसी कार्यक्रम को सुरक्षा कारणों का हवाला देकर टालने या रद्द करने की नौबत पैदा हो सकती है।
उनका पूरा बयान मूलतः व्यंग्य और राजनीतिक टिप्पणी के रूप में सामने आया है, जिसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

विदेश मंत्रालय के बयान ने भी खींचा ध्यान
विवाद के बीच भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल के पुराने बयान का भी संदर्भ सामने आया है। यह बयान अमेरिकी संस्था USCIRF द्वारा RSS से संबंधित की गई टिप्पणियों/सिफारिशों के संदर्भ में था।
जायसवाल ने USCIRF को पक्षपाती संस्था बताते हुए कहा था कि वह लंबे समय से भारत के संबंध में अपमानजनक और भड़काऊ टिप्पणियां करती रही है तथा ऐसी संस्थाओं से दूरी बनाए रखना चाहिए।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह बयान मौजूदा मैडिसन स्क्वेयर गार्डन कार्यक्रम के संबंध में दिया गया नया बयान नहीं है। इसे वर्तमान विवाद से जोड़ते समय उसके मूल संदर्भ को ध्यान में रखना आवश्यक है।
RSS को लेकर कांग्रेस का हमला
कांग्रेस नेताओं ने इस पूरे मामले को RSS की विचारधारा और संगठनात्मक पारदर्शिता से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस नेता नाना पटोले ने RSS के संगठनात्मक ढांचे, पंजीकरण और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाते हुए आरोप लगाए हैं। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि RSS के वित्तीय स्रोत क्या हैं और उसके धन का इस्तेमाल किस प्रकार किया जाता है।
हालांकि, ये राजनीतिक आरोप हैं और इनका स्वतंत्र दस्तावेजी सत्यापन आवश्यक है। किसी संगठन की वित्तीय पारदर्शिता से संबंधित गंभीर आरोपों को प्रमाणित रिकॉर्ड के आधार पर ही अंतिम तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
RSS पर प्रतिबंध का इतिहास भी बहस में आया
मनुस्मृति और RSS की विचारधारा से लेकर महात्मा गांधी की हत्या के बाद RSS पर लगे प्रतिबंध तक, इस विवाद ने स्वतंत्र भारत के शुरुआती राजनीतिक इतिहास को भी बहस में ला दिया है।
महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में RSS पर प्रतिबंध लगाया गया था। बाद में प्रतिबंध हटाया गया। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को लेकर आज भी अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक व्याख्याएं मौजूद हैं।
यही कारण है कि मौजूदा विवाद में दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक और ऐतिहासिक तर्क सामने रख रहे हैं।
भाजपा की ओर से ममदानी पर पलटवार
भाजपा नेताओं ने ममदानी के बयान की आलोचना करते हुए कहा है कि उन्हें RSS के कार्यक्रम को लेकर इस तरह की टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। भाजपा की ओर से यह भी कहा गया कि कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग शामिल होंगे और उसका उद्देश्य शांति, एकता तथा विचार-विमर्श है।
एक भाजपा नेता ने ममदानी के बयान को विभाजनकारी बताते हुए कहा कि उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर इस तरह की टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।
लेकिन इसके जवाब में दूसरा सवाल भी उठता है—जब भारत में किसी कलाकार, कॉमेडियन या राजनीतिक कार्यक्रम के खिलाफ धमकियों अथवा विरोध के आधार पर कार्यक्रम प्रभावित होते हैं, तब लोकतांत्रिक अधिकारों की यही कसौटी सभी के लिए समान क्यों नहीं होनी चाहिए?
उद्धव सेना ने रखा अलग रुख
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे गुट के नेता आनंद दुबे ने इस मामले में अपेक्षाकृत अलग रुख रखा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन विदेश में भारत के किसी व्यक्ति या नेता के साथ अपमानजनक व्यवहार नहीं होना चाहिए।
उनका कहना था कि भारत ने हमेशा अतिथियों का स्वागत किया है और उम्मीद की जानी चाहिए कि विदेशों में भी भारतीय प्रतिनिधियों के प्रति सम्मान का व्यवहार हो।
यह बयान इस पूरे विवाद में एक तीसरा दृष्टिकोण सामने लाता है—RSS की विचारधारा से असहमति हो सकती है, लेकिन विदेश में किसी भारतीय के कार्यक्रम को लेकर राष्ट्रीय सम्मान का प्रश्न अलग है।
सबसे बड़ा सवाल: लोकतांत्रिक असहमति बनाम कार्यक्रम रोकने का अधिकार
मैडिसन स्क्वेयर गार्डन विवाद को यदि राजनीतिक नारों से अलग करके देखा जाए तो इसके केंद्र में दो महत्वपूर्ण सवाल हैं।
पहला—क्या किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को किसी संगठन की विचारधारा का विरोध करने का लोकतांत्रिक अधिकार है? इसका जवाब स्पष्ट रूप से हां है।
दूसरा—क्या विरोध करने वाला जनप्रतिनिधि किसी निजी स्थल पर आयोजित कार्यक्रम को अपनी इच्छा से रद्द कर सकता है? इसका जवाब उस देश के कानून, आयोजन स्थल और स्थानीय प्रशासन के अधिकार क्षेत्र पर निर्भर करेगा।
न्यूयॉर्क के मेयर ने खुद कहा है कि वे कार्यक्रम का समर्थन नहीं करते, लेकिन निजी आयोजन को रद्द करने के लिए शहर के अधिकार क्षेत्र को लेकर सीमाएं हैं।
यानी ममदानी का विरोध और कार्यक्रम का जारी रहना—दोनों एक साथ संभव हैं। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि किसी विचार का विरोध करना और उस विचार को कानून के दायरे में अपनी बात रखने से रोक देना एक ही बात नहीं है।
फोर्थ पिलर का सवाल: लोकतंत्र की कसौटी सबके लिए एक जैसी क्यों नहीं?
इस पूरे घटनाक्रम ने भारत के सामने भी एक असहज लेकिन जरूरी सवाल खड़ा किया है।
यदि किसी संगठन, नेता, कलाकार या विचारधारा से असहमति है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसका विरोध किया जाना चाहिए। लेकिन क्या विरोध के नाम पर कार्यक्रम रद्द कर देना उचित है? क्या किसी निजी स्थल पर होने वाले आयोजन को राजनीतिक दबाव या संभावित विरोध के आधार पर रोकना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या यह अधिकार केवल पसंदीदा विचारों और संगठनों के लिए होना चाहिए, या असहमति वाले विचारों के लिए भी समान रूप से लागू होना चाहिए?
भारत में कुणाल कामरा, मुनव्वर फारूकी और अन्य कलाकारों के कार्यक्रमों को लेकर सामने आए विवादों का संदर्भ देते हुए यह सवाल और गंभीर हो जाता है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब हम उस व्यक्ति या संगठन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी रक्षा करें, जिसकी विचारधारा से हम स्वयं सहमत नहीं हैं।
फोर्थ पिलर की संपादकीय टिप्पणी
फोर्थ पिलर का मानना है कि RSS की विचारधारा का समर्थन करना हो या उसका विरोध—दोनों लोकतांत्रिक अधिकार हैं। मोहन भागवत का अमेरिका में कार्यक्रम हो या भारत में किसी कलाकार का शो, कानून का पैमाना सभी के लिए समान होना चाहिए।
किसी भाषण में यदि कानून का उल्लंघन होता है तो कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। यदि कोई संगठन या व्यक्ति संविधान विरोधी या हिंसक गतिविधि करता है तो जांच और कानूनी प्रक्रिया होनी चाहिए। लेकिन केवल विचारधारा से असहमति के आधार पर किसी कार्यक्रम को रोकना लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करता है।
न्यूयॉर्क के इस घटनाक्रम की सबसे बड़ी सीख यही है—विरोध कीजिए, सवाल पूछिए, वैचारिक लड़ाई लड़िए; लेकिन अंतिम फैसला कानून और संवैधानिक व्यवस्था को करने दीजिए।
— अब्दुल शेख करीम
प्रधान संपादक, फोर्थ पिलर न्यूज़ नेटवर्क (4thPiller.com)








