नर्सिंग शिक्षा का ‘सिस्टम’ सवालों के घेरे में: शिकायत पर कार्रवाई की जगह उसी विभाग को जांच?
INC मान्यता, संबद्धता, सीटों, PNT परीक्षा और 0 अंक वाले अभ्यर्थियों के प्रवेश से जुड़े सवालों का जवाब आखिर देगा कौन?
4thpiller.com विशेष संपादकीय | रायपुर
छत्तीसगढ़ में नर्सिंग शिक्षा को लेकर पिछले कई वर्षों से उठते आ रहे सवाल अब केवल किसी एक कॉलेज, एक विश्वविद्यालय या किसी एक अधिकारी तक सीमित नहीं रह गए हैं। मामला अब उस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, जिसके जिम्मे हजारों छात्र-छात्राओं के भविष्य की सुरक्षा है।
एक तरफ भारतीय उपचर्या परिषद यानी Indian Nursing Council (INC), नई दिल्ली के मानकों और उपयुक्तता (Suitability) की बात की जाती है, दूसरी तरफ राज्य स्तर पर नर्सिंग कॉलेजों को अनुमति, संबद्धता, सीटों और प्रवेश की प्रक्रिया चलती रहती है। कभी कॉलेजों को INC से Suitability लेने के निर्देश दिए जाते हैं, कभी समय-सीमा बढ़ती है, कभी प्रवेश की शर्तों में राहत की मांग की जाती है और कभी ऐसे विद्यार्थियों के लिए रास्ता तलाशा जाता है जो निर्धारित PNT प्रवेश परीक्षा में आवश्यक प्रतिशताइल तक नहीं पहुंच पाए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में विद्यार्थी कहां है?
वह विद्यार्थी जिसने चार वर्ष पढ़ाई के लिए लगाए, परिवार ने लाखों रुपये खर्च किए और अंत में यदि उसे ऐसी डिग्री या प्रमाणपत्र मिलता है जिसकी दूसरे राज्यों में मान्यता अथवा पंजीयन को लेकर प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
और अब जब एक शिकायत पर विभागीय स्तर से ऐसा पत्र सामने आया है जिसमें शिकायत से जुड़े मामले को उसी प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर आगे बढ़ाया गया है, तो सवाल और गंभीर हो जाता है—यदि शिकायत जिस व्यवस्था के अधिकारियों और निर्णयों से जुड़ी है, जांच भी उसी व्यवस्था के पास चली जाए तो निष्पक्षता का भरोसा कैसे बनेगा?
शिकायत से कार्रवाई तक पहुंचते-पहुंचते फिर ‘पत्राचार’ में क्यों फंस गया मामला?

इस पूरे प्रकरण का सबसे ताजा और महत्वपूर्ण पहलू है—शिकायत के बाद सामने आया विभागीय पत्र।
शिकायतकर्ता द्वारा नर्सिंग शिक्षा से जुड़े अनेक गंभीर बिंदुओं को शासन के समक्ष रखा गया। इनमें INC की मान्यता/उपयुक्तता, राज्य स्तरीय अनुमति, विश्वविद्यालय की संबद्धता, प्रवेश प्रक्रिया, विद्यार्थियों के भविष्य, PNT परीक्षा, 0 अंक या निर्धारित पात्रता पूरी न करने वाले अभ्यर्थियों को प्रवेश देने के प्रयास तथा विभिन्न विभागों द्वारा जारी आदेशों की भूमिका जैसे मुद्दे शामिल हैं।
लेकिन शिकायत के बाद जिस प्रकार मामला आगे बढ़ा, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार वास्तव में तथ्यों की स्वतंत्र जांच चाहती है या केवल शिकायत का जवाब तैयार कर औपचारिकता पूरी करना चाहती है?
उपलब्ध पत्र को देखने पर यह स्पष्ट है कि शिकायत को लेकर विभागीय स्तर पर पत्राचार हुआ है। लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप है कि जिस व्यवस्था के अधिकारियों और निर्णयों पर सवाल उठाए गए हैं, उसी विभागीय तंत्र को मामले की जांच/जवाबदेही की प्रक्रिया में लगा देना निष्पक्ष जांच की भावना पर प्रश्न खड़ा करता है।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है—
क्या किसी विभाग के विरुद्ध प्रशासनिक अनियमितता की शिकायत होने पर उसी विभाग से केवल जवाब मांगना पर्याप्त है?
अगर शिकायत किसी अधिकारी के निर्णय की वैधानिकता पर है, तो उसी अधिकारी के अधीनस्थ तंत्र से रिपोर्ट मंगाने के बजाय स्वतंत्र जांच एजेंसी, उच्चस्तरीय समिति या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी से परीक्षण कराया जाना अधिक विश्वसनीय नहीं होगा?
पहला सवाल: INC की Suitability आखिर इतनी महत्वपूर्ण है तो इसे लागू कौन कराएगा?
4 अप्रैल 2024 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति स्वास्थ्य विज्ञान एवं आयुष विश्वविद्यालय, रायपुर द्वारा पत्र क्रमांक F-210/797/डी.यू.एच.एस./अका/2024 जारी किया गया था।
इस पत्र में विश्वविद्यालय से संबद्ध निजी नर्सिंग महाविद्यालयों को भारतीय उपचर्या परिषद (INC), नई दिल्ली से Suitability प्राप्त करने के संबंध में निर्देश दिए गए।
पत्र में INC Gazette Notification No. 97 अर्थात Indian Nursing Council (Minimum Pre-Requisites for Granting Suitability to Nursing Programs) Regulation-2020, दिनांक 12 मार्च 2021 का संदर्भ दिया गया।
विश्वविद्यालय ने स्पष्ट रूप से कहा था कि जिन महाविद्यालयों को INC से Suitability प्राप्त नहीं हुई है, वे संबंधित Gazette Notification के अनुसार छत्तीसगढ़ नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल से मान्यता प्राप्त करने के छह माह के भीतर INC के समक्ष Suitability के लिए आवेदन करें।
और महत्वपूर्ण बात—
यदि निर्धारित अवधि में Suitability प्राप्त नहीं की जाती है तो आगामी सत्र में विश्वविद्यालय द्वारा संबद्धता संबंधी कार्रवाई नहीं की जाएगी।
अब सवाल है—
यदि यह निर्देश वास्तव में गंभीर था तो इसका पालन कितने कॉलेजों ने किया?
कितने कॉलेजों की संबद्धता रोकी गई?
कितने कॉलेजों से संबद्धता शुल्क नहीं लिया गया?
और कितने कॉलेज आज भी विद्यार्थियों का प्रवेश लेकर संचालित हो रहे हैं?
यदि इन प्रश्नों का स्पष्ट सार्वजनिक उत्तर उपलब्ध नहीं है तो 4 अप्रैल 2024 का आदेश आखिर किस उद्देश्य से था?
क्या वह आदेश केवल फाइलों में मौजूद रहने के लिए था?
दूसरा सवाल: 6 महीने की समय-सीमा खत्म हुई, फिर क्या हुआ?
राज्य नर्सिंग काउंसिल द्वारा भी नर्सिंग कॉलेजों को INC से मान्यता/उपयुक्तता लेने के संबंध में निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई।
पूर्व में उपलब्ध जानकारी के अनुसार 30 दिसंबर 2024 को कॉलेजों को आगामी छह माह में INC, नई दिल्ली से मान्यता/उपयुक्तता प्राप्त करने के लिए कहा गया था तथा यह भी कहा गया था कि ऐसा नहीं करने पर सत्र 2025-26 की अनुमति प्रभावित हो सकती है।
छह माह की अवधि 30 जून 2025 के आसपास समाप्त हो गई।
अब सवाल है—
30 जून के बाद कितने कॉलेजों की अनुमति रोकी गई?
क्या सभी कॉलेजों ने INC की शर्तें पूरी कर ली थीं?
अगर नहीं, तो फिर सत्र 2025-26 में प्रवेश और संबद्धता कैसे आगे बढ़ी?
यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक व्यवस्था की कथनी और करनी के बीच अंतर दिखाई देता है।
तीसरा सवाल: चिकित्सा शिक्षा विभाग ने विद्यार्थियों को चेतावनी दी, लेकिन सूची क्यों नहीं दी?
आयुक्त चिकित्सा शिक्षा कार्यालय द्वारा 4 अक्टूबर 2024 को विद्यार्थियों को यह बताने संबंधी सूचना जारी किए जाने की बात सामने आई कि गैर-INC मान्यता प्राप्त संस्थान में प्रवेश लेने पर पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद उनके प्रमाणपत्र/डिग्री के छत्तीसगढ़ के बाहर पंजीयन में समस्या हो सकती है।
यदि यह चेतावनी विद्यार्थियों के हित में थी तो यह स्वागत योग्य कदम था।
लेकिन यहां अगला सवाल और भी महत्वपूर्ण है—
जब विभाग को पता था कि कुछ संस्थानों की INC मान्यता/उपयुक्तता की स्थिति अलग-अलग है, तो विद्यार्थियों को स्पष्ट सूची क्यों नहीं उपलब्ध कराई गई?
एक नया विद्यार्थी कैसे पता लगाए कि कौन-सा कॉलेज INC के मानकों के अनुरूप है और कौन नहीं?
सिर्फ यह कह देना कि “गैर-मान्यता प्राप्त कॉलेज में प्रवेश न लें” पर्याप्त है क्या?
जब सरकारी व्यवस्था के पास संस्थानों की स्थिति का रिकॉर्ड है तो वह सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
यही जानकारी विद्यार्थियों को गलत संस्थान में प्रवेश लेने से बचा सकती है।
चौथा सवाल: 7216 बनाम 3800—आखिर आंकड़ों का यह अंतर क्या कहता है?
पूर्व में उपलब्ध दस्तावेजों में INC और राज्य स्तर के आंकड़ों को लेकर गंभीर अंतर सामने आया था।
29 जनवरी 2024 के चिकित्सा शिक्षा संचालनालय के पत्र में INC को भेजी गई जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ में 124 SNRC-recognised institutions और 7216 sanctioned seats का उल्लेख था।
उसी पत्र में INC द्वारा Section 13 & 14 के तहत recognised and found suitable संस्थानों की संख्या 80 तथा sanctioned seats 3800 बताई गई थी।
यानी दस्तावेज में एक तरफ 7216 सीटों का राज्य स्तरीय आंकड़ा दिखाई देता है, दूसरी तरफ INC द्वारा उपयुक्त पाए गए संस्थानों की sanctioned seats 3800 बताई गई हैं।
यह अंतर कोई मामूली प्रशासनिक आंकड़ा नहीं है।
यह हजारों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।
यदि 7216 और 3800 के बीच का अंतर नियामकीय स्थिति, Suitability या अन्य कारणों से है तो सरकार को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि इन अतिरिक्त सीटों की वैधानिक स्थिति क्या है?
क्या इन सीटों पर पढ़ने वाले विद्यार्थियों की डिग्री को अन्य राज्यों में समान रूप से स्वीकार किया जाएगा?
क्या उन्हें दूसरे राज्यों में Nursing Registration मिल सकेगा?
क्या सरकारी नौकरी में उनकी पात्रता पर कोई प्रभाव पड़ेगा?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब विद्यार्थी और अभिभावक दोनों मांग रहे हैं।
पांचवां सवाल: GNM से B.Sc. Nursing Upgrade की प्रक्रिया
इस पूरे मामले का एक और संवेदनशील पहलू GNM से B.Sc. Nursing में Upgrade किए गए संस्थानों से जुड़ा है।
पूर्व में उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुछ संस्थानों को राज्य स्तर पर B.Sc. Nursing के लिए आगे बढ़ाया गया, जबकि INC की Suitability/मान्यता की स्थिति को लेकर प्रश्न उठे।
यदि कोई संस्थान राज्य स्तर पर अनुमति प्राप्त कर लेता है लेकिन राष्ट्रीय नियामकीय मानकों के स्तर पर उसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो विद्यार्थी को प्रवेश देने से पहले यह स्थिति सार्वजनिक करना आवश्यक है।
क्योंकि विद्यार्थी कॉलेज का विज्ञापन देखकर प्रवेश लेता है।
वह यह जांचने के लिए विशेषज्ञ नहीं है कि कौन-सी अनुमति किस कानून के तहत है और कौन-सी अनुमति किस नियामक संस्था की है।
इसलिए नियामकीय अस्पष्टता का बोझ विद्यार्थी पर डालना न्यायसंगत नहीं हो सकता।
छठा सवाल: आयुष विश्वविद्यालय—संबद्धता किस आधार पर?
यहां आयुष विश्वविद्यालय की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि विश्वविद्यालय ने स्वयं 4 अप्रैल 2024 के पत्र में INC Suitability को लेकर छह माह की समय-सीमा तय की थी और यह संकेत दिया था कि Suitability न होने पर आगामी सत्र में संबद्धता संबंधी कार्रवाई नहीं होगी, तो फिर उस शर्त का वास्तविक अनुपालन कैसे हुआ?
विश्वविद्यालय को एक सार्वजनिक सूची जारी करनी चाहिए—
- कौन-कौन से कॉलेज INC से Suitable हैं?
- कौन-कौन से कॉलेज केवल राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त हैं?
- किन कॉलेजों की Suitability लंबित है?
- किन कॉलेजों के विरुद्ध न्यायालयीन प्रकरण लंबित हैं?
- किन कॉलेजों की संबद्धता रोकी गई?
- किन कॉलेजों को किन शर्तों पर संबद्धता दी गई?
जब तक यह जानकारी सार्वजनिक नहीं होती, तब तक विद्यार्थी भ्रम में रहेगा।
सातवां सवाल: न्यायालय में मामला लंबित होने पर विद्यार्थियों का भविष्य कौन संभालेगा?
पूर्व में सामने आए B.Ed. मामले की तरह नर्सिंग क्षेत्र में भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि जब किसी कॉलेज की मान्यता या नियामकीय स्थिति न्यायालय में विचाराधीन हो, तब उस संस्थान में नए प्रवेश का जोखिम कौन उठाएगा?
यहां एक सामान्य प्रशासनिक सिद्धांत समझना जरूरी है—
किसी मामले का न्यायालय में लंबित होना अपने आप में संस्था को दोषी या निर्दोष सिद्ध नहीं करता।
अंतिम निर्णय न्यायालय ही करेगा।
लेकिन यदि किसी संस्थान की वैधता पर गंभीर न्यायालयीन विवाद लंबित है तो नए विद्यार्थियों को उसकी स्थिति स्पष्ट करके प्रवेश देना चाहिए।
क्योंकि यदि बाद में संस्था के विरुद्ध निर्णय आता है तो सबसे ज्यादा नुकसान विद्यार्थी को होगा।
उस समय कॉलेज प्रबंधन शायद कानूनी लड़ाई लड़ लेगा, अधिकारी अपना रिकॉर्ड दिखा देंगे और विभाग अपने आदेशों का हवाला दे देगा।
लेकिन विद्यार्थी?
उसके चार साल कौन लौटाएगा?
उसके माता-पिता द्वारा खर्च किए गए लाखों रुपये कौन लौटाएगा?
उसकी उम्र, नौकरी का अवसर और करियर की शुरुआत कौन वापस करेगा?
आठवां सवाल: PNT परीक्षा और 0 अंक वाले विद्यार्थियों का मामला
अब इस पूरे प्रकरण में सबसे विवादित विषयों में से एक है—PNT प्रवेश परीक्षा में निर्धारित मानदंड पूरा न करने वाले विद्यार्थियों को प्रवेश देने की कोशिश।
पूर्व में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से INC, नई दिल्ली को प्रवेश प्रक्रिया में राहत देने तथा अंतिम तिथि बढ़ाने संबंधी पत्राचार हुआ।
28 नवंबर 2025 के पत्र क्रमांक STU-49/5/2025-DME में B.Sc. Nursing में प्रवेश के लिए Percentile की बाध्यता समाप्त करने तथा प्रवेश की अंतिम तिथि 31 दिसंबर 2025 तक बढ़ाने का अनुरोध किया गया था।
पत्र में यह भी बताया गया कि B.Sc. Nursing पाठ्यक्रम में कुल 7811 सीटें उपलब्ध हैं और प्रथम चरण की काउंसलिंग के बाद पुनः आवेदन प्राप्त होने के बावजूद 4147 सीटें रिक्त हैं।
यह तथ्य अपने आप में एक अलग प्रश्न खड़ा करता है—
यदि सीटें बड़ी संख्या में रिक्त हैं तो क्या समाधान विद्यार्थियों के मूल पात्रता मानदंड को कमजोर करना है?
या सरकार को यह जांचना चाहिए कि सीटें खाली क्यों रह गईं?
नौवां सवाल: मंत्री की नोटशीट का वास्तविक आशय क्या था?
यही वह बिंदु है जिस पर विभाग से स्पष्ट जवाब अपेक्षित है।
पूर्व में उपलब्ध जानकारी के अनुसार 28 नवंबर 2025 के पत्र में चिकित्सा शिक्षा मंत्री की 21 नवंबर की विभागीय टीप का उल्लेख किया गया।
लेकिन शिकायतकर्ता के अनुसार मंत्री की नोटशीट में यह जानने की बात कही गई थी कि—
नर्सिंग प्रवेश परीक्षा आयोजित होने के बाद अन्य राज्यों में प्रवेश देने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई है।
अर्थात विभागीय स्तर पर प्रक्रिया का परीक्षण कर जानकारी मंत्री कार्यालय को वापस प्रस्तुत की जानी थी।
यदि यही नोटशीट का वास्तविक आशय था तो फिर सवाल उठता है—
क्या उस नोटशीट को आधार बनाकर INC नई दिल्ली को Percentile घटाने तथा प्रवेश की अंतिम तारीख बढ़ाने का पत्र भेजना विभागीय रूप से उचित था?
यहां किसी अधिकारी पर सीधे दोषारोपण करने के बजाय एक निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।
क्योंकि मामला केवल एक पत्र का नहीं है।
मामला यह जानने का है कि—
मंत्री की टीप → विभागीय परीक्षण → निर्णय → INC को पत्र
इन चारों चरणों में वास्तव में क्या हुआ?
किस अधिकारी ने क्या प्रस्ताव रखा?
किस अधिकारी ने फाइल आगे बढ़ाई?
किस स्तर पर निर्णय का स्वरूप बदला?
और अंततः पत्र जारी करने का आधार क्या था?
दसवां सवाल: 31 दिसंबर तक प्रवेश—लेकिन पात्रता का क्या?
INC के 22 अक्टूबर 2025 के Notification No. 13 of 2025 में ANM, GNM और B.Sc. Nursing कार्यक्रमों के लिए प्रवेश की अंतिम तिथि 30 नवंबर 2025 तक बढ़ाए जाने का उल्लेख था।
उस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया था कि निर्धारित तिथि तक प्रवेशित विद्यार्थियों की संख्या sanctioned strength से अधिक नहीं होनी चाहिए।
B.Sc. Nursing के संबंध में Regular और Irregular Batch की अलग-अलग व्यवस्था तथा अलग परीक्षा आयोजित करने की बात भी उल्लेखित थी।
और सबसे महत्वपूर्ण—
INC ने यह भी स्पष्ट किया कि admission criteria में कोई deviation स्वीकार नहीं किया जाएगा तथा नियमों का उल्लंघन होने पर संबंधित State Examination Board/Council/University द्वारा कार्रवाई की जानी चाहिए।
यानी राष्ट्रीय नियामक के आदेश में एक तरफ समय-सीमा के संबंध में राहत दी गई, लेकिन दूसरी तरफ eligibility criteria से समझौता न करने की बात भी स्पष्ट रखी गई।
इस अंतर को समझना जरूरी है।
Admission date बढ़ना और eligibility criteria समाप्त होना—दो अलग बातें हैं।
यही बात विद्यार्थियों और अभिभावकों को स्पष्ट रूप से बताई जानी चाहिए।
ग्यारहवां सवाल: निजी कॉलेजों की फीस और प्रवेश का खेल
इस पूरे प्रकरण का आर्थिक पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
पूर्व में उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर निजी संस्थानों की फीस निर्धारण, AFRC/FRC की भूमिका तथा SCERT की counselling में निजी विश्वविद्यालयों/संस्थानों की भागीदारी को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
जहां सामान्य B.Ed. कॉलेजों की फीस लगभग ₹32,000 वार्षिक बताए जाने का उल्लेख सामने आया, वहीं निजी विश्वविद्यालयों के मामले में लगभग ₹66,400 वार्षिक फीस का आंकड़ा सामने रखा गया।
यहां मूल सवाल यह है कि कोई संस्था जब अपने लिए विश्वविद्यालय का दर्जा बताकर फीस नियमन की प्रक्रिया से बाहर रहने का लाभ लेती है और दूसरी तरफ प्रवेश के समय कॉलेज की तरह counselling व्यवस्था में शामिल होती है, तो नियामकीय वर्गीकरण स्पष्ट कैसे होगा?
संस्था विश्वविद्यालय है या कॉलेज?
यदि विश्वविद्यालय है तो प्रवेश प्रक्रिया और फीस का नियमन किस व्यवस्था के अंतर्गत होगा?
यदि कॉलेज है तो संबंधित फीस नियामक व्यवस्था लागू होगी या नहीं?
ऐसे सवालों का जवाब सरकार को देना चाहिए।
बारहवां सवाल: SCERT के B.Ed. सीट आवंटन पर भी उठ चुके हैं प्रश्न
इसी चैट में पूर्व में सामने आए 10 पेज के दस्तावेज से संबंधित जानकारी के अनुसार 147 महाविद्यालयों को B.Ed. सीटों का आवंटन किया गया था।
उनमें कुछ क्रमांकित संस्थानों की मान्यता से संबंधित मामले उच्च न्यायालय में अंतिम निर्णय के लिए लंबित होने का दावा किया गया था।
इसके बावजूद counselling/seat allotment की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर सवाल उठाए गए।
यहां भी सिद्धांत वही है—
यदि अंतिम न्यायिक स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो विद्यार्थियों को जोखिम की पूरी जानकारी देना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
यहां किसी कॉलेज को दोषी ठहराना उद्देश्य नहीं है।
उद्देश्य यह है कि यदि बाद में न्यायालय का निर्णय विपरीत आता है तो विद्यार्थी की सुरक्षा के लिए सरकार ने पहले से क्या व्यवस्था की है?
तेरहवां सवाल: शिकायतकर्ता आखिर जाए तो जाए कहां?
अब आते हैं इस पूरे मामले के सबसे संवेदनशील पहलू पर।
यदि कोई सामाजिक कार्यकर्ता, विद्यार्थी, अभिभावक या पत्रकार किसी प्रशासनिक अनियमितता की शिकायत करता है तो व्यवस्था में उसके लिए कई रास्ते बनाए गए हैं—
- विभागीय शिकायत,
- वरिष्ठ अधिकारी,
- कलेक्टर,
- सचिव,
- मंत्री,
- EOW,
- ACB,
- न्यायालय,
- RTI,
- लोकायुक्त जैसी वैधानिक व्यवस्थाएं।
लेकिन यदि शिकायत के बाद मामला घूम-फिरकर उसी विभाग में चला जाए जिसके अधिकारियों के निर्णय पर शिकायत की गई है, तो शिकायतकर्ता के मन में निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह किसी एक विभाग की आलोचना नहीं, बल्कि प्रशासनिक जांच की विश्वसनीयता का प्रश्न है।
अगर शिकायत में किसी अधिकारी के आदेश, प्रक्रिया या संभावित अनियमितता की जांच होनी है तो क्या उसी प्रशासनिक श्रृंखला से जांच कराना पर्याप्त है?
या स्वतंत्र अधिकारी/समिति से जांच कराना अधिक उचित होगा?
EOW और ACB का गठन आखिर किसलिए?
भ्रष्टाचार और आर्थिक अनियमितताओं की जांच के लिए राज्य में EOW और ACB जैसी संस्थाएं इसलिए बनाई गई हैं कि जब किसी सरकारी तंत्र पर गंभीर आरोप हों तो स्वतंत्र जांच की जा सके।
इसलिए यदि किसी शिकायत में भ्रष्टाचार, आर्थिक लाभ, पद के दुरुपयोग या मिलीभगत के ठोस दस्तावेजी आरोप हों तो केवल विभागीय जवाब से मामला समाप्त कर देना पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है—
किसी अधिकारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार सिद्ध होने से पहले उसे भ्रष्ट कहना उचित नहीं है।
इसलिए हमारी मांग किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने की नहीं, बल्कि—
दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच की है।
यदि आरोप गलत हैं तो जांच के बाद अधिकारी बेदाग साबित होंगे।
यदि आरोप सही हैं तो दोषियों पर कार्रवाई होगी।
दोनों ही परिस्थितियों में व्यवस्था मजबूत होगी।
14वां सवाल: INC की भूमिका भी जांच से बाहर क्यों रहे?
इस पूरे मामले में केवल राज्य सरकार ही नहीं, INC की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
कभी INC मानकों का हवाला देकर पत्र जारी करती है।
कभी admission date बढ़ाई जाती है।
कभी राज्य सरकारों के अनुरोध पर राहत दी जाती है।
लेकिन यदि राज्य में बड़ी संख्या में संस्थान राष्ट्रीय स्तर की Suitability के बिना चल रहे हैं तो सवाल उठता है—
INC को राज्य स्तर पर वास्तविक स्थिति की निगरानी कैसे करनी चाहिए?
क्या केवल पत्र जारी करना पर्याप्त है?
क्या प्रत्येक संस्थान की स्थिति सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध नहीं होनी चाहिए?
विद्यार्थी को प्रवेश लेने से पहले यह क्यों न दिखाई दे कि—
यह कॉलेज INC द्वारा Suitable है / नहीं है / आवेदन लंबित है / मान्यता किस वर्ष की है / कितनी सीटें स्वीकृत हैं?
जब ऐसी जानकारी ऑनलाइन और पारदर्शी होगी तो दलालों, भ्रमित करने वाले विज्ञापनों और गलत दावों की गुंजाइश अपने आप कम होगी।
सबसे बड़ा सवाल: इस पूरे खेल में विद्यार्थी कहां है?
इस पूरे विवाद को यदि एक विद्यार्थी की आंखों से देखें तो तस्वीर बेहद चिंताजनक दिखाई देती है।
एक विद्यार्थी 12वीं के बाद नर्सिंग को अपना करियर बनाना चाहता है।
परिवार उससे उम्मीद करता है।
वह कॉलेज का विज्ञापन देखता है।
सरकारी अनुमति का नाम देखकर भरोसा करता है।
फीस जमा करता है।
चार वर्ष पढ़ता है।
प्रैक्टिकल करता है।
परीक्षा देता है।
फिर नौकरी के लिए आवेदन करता है।
और उसी समय उसे पता चलता है कि उसके कॉलेज की राष्ट्रीय स्तर की मान्यता/उपयुक्तता को लेकर विवाद है।
उसका पंजीयन किसी दूसरे राज्य में नहीं हो पा रहा।
किसी भर्ती में उसकी पात्रता पर सवाल उठ रहा है।
तब उसके पास केवल एक सवाल बचता है—
जब मैंने प्रवेश लिया था तब सरकार कहां थी?
चार साल और पांच-छह लाख रुपये—क्या इसकी कोई कीमत नहीं?
पूर्व में इस मामले में यह आरोप सामने आया कि कई विद्यार्थियों ने लगभग चार वर्ष और लाखों रुपये खर्च किए हैं।
हम यह आंकड़ा हर विद्यार्थी पर लागू नहीं कर रहे, लेकिन समस्या की गंभीरता समझने के लिए यह सवाल पर्याप्त है।
यदि किसी विद्यार्थी ने ₹4-6 लाख खर्च किए हैं और चार वर्ष पढ़ाई में लगा दिए हैं, तो यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं है।
यह है—
- समय का नुकसान,
- उम्र का नुकसान,
- नौकरी के अवसर का नुकसान,
- परिवार की आर्थिक क्षमता का नुकसान,
- मानसिक तनाव,
- और भविष्य की अनिश्चितता।
सरकार को यह तय करना होगा कि शिक्षा व्यवस्था में नियामकीय गलती का जोखिम विद्यार्थी क्यों उठाए?
क्या यह ‘सिस्टम की गलती’ है या किसी को फायदा पहुंचाने की व्यवस्था?

यही वह सवाल है जिसे जांच एजेंसी को देखना चाहिए।
हम किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी घोषित नहीं कर रहे।
लेकिन यदि लगातार कई वर्षों तक—
- मान्यता की स्थिति स्पष्ट नहीं,
- Suitability को लेकर आदेश जारी,
- फिर समय सीमा समाप्त,
- फिर भी संबद्धता,
- नए कॉलेजों को अनुमति,
- सीटों में वृद्धि,
- प्रवेश प्रक्रिया जारी,
- पात्रता में राहत की मांग,
- विद्यार्थियों को अलग-अलग पत्रों से अलग-अलग जानकारी,
- और शिकायत के बाद भी स्वतंत्र जांच नहीं,
तो क्या यह केवल प्रशासनिक भूल है?
या कहीं न कहीं व्यवस्था की संरचनात्मक विफलता है?
यदि आर्थिक लाभ या निजी हित का कोई तत्व है तो उसकी जांच होनी चाहिए।
और यदि ऐसा कुछ नहीं है तो जांच के बाद यह बात साफ हो जाएगी।
सरकार के सामने अब पांच सीधे सवाल
सवाल नंबर 1
छत्तीसगढ़ में राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त और INC द्वारा Suitable/मान्य संस्थानों की वर्तमान आधिकारिक सूची सार्वजनिक क्यों नहीं है?
सवाल नंबर 2
7216 राज्य स्तरीय sanctioned seats और INC द्वारा बताए गए 3800 suitable sanctioned seats के बीच अंतर की आधिकारिक स्थिति क्या है?
सवाल नंबर 3
4 अप्रैल 2024 के विश्वविद्यालय आदेश के बाद कितने कॉलेजों ने छह माह के भीतर INC Suitability प्राप्त की और कितनों की संबद्धता रोकी गई?
सवाल नंबर 4
PNT/Percentile में राहत और प्रवेश तिथि बढ़ाने के मामलों में मंत्री की नोटशीट का वास्तविक आशय क्या था और उसके आधार पर विभाग ने क्या कार्रवाई की?
सवाल नंबर 5
शिकायतों की स्वतंत्र जांच कराने के बजाय यदि मामला उसी विभागीय तंत्र में भेजा जाता है तो शिकायतकर्ता निष्पक्ष जांच का भरोसा किस आधार पर करे?
स्वास्थ्य मंत्री से भी अब जवाब अपेक्षित
चिकित्सा शिक्षा राज्य सरकार का संवेदनशील विभाग है।
यहां लिए गए निर्णय सीधे विद्यार्थियों और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों को प्रभावित करते हैं।
इसलिए स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे इस पूरे मामले की विभागीय फाइलों की स्वतंत्र समीक्षा कराएं।
यह किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का मुद्दा नहीं है।
यह विद्यार्थी के भविष्य का मुद्दा है।
यदि विभाग सही काम कर रहा है तो स्वतंत्र जांच से वह और मजबूत होकर सामने आएगा।
यदि कहीं गलती हुई है तो उसे सुधारा जा सकेगा।
और यदि किसी स्तर पर भ्रष्टाचार या पद के दुरुपयोग के प्रमाण मिलते हैं तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को अब हस्तक्षेप करना चाहिए
यह मामला केवल चिकित्सा शिक्षा विभाग के स्तर पर छोड़ना शायद पर्याप्त नहीं होगा।
मुख्य सचिव स्तर पर एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की जा सकती है, जिसमें चिकित्सा शिक्षा विभाग के अलावा विधि विभाग, सामान्य प्रशासन विभाग तथा आवश्यकतानुसार स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल हों।
जांच के दायरे में कम से कम ये बिंदु होने चाहिए—
- राज्य में नर्सिंग कॉलेजों की वास्तविक संख्या।
- प्रत्येक कॉलेज की INC स्थिति।
- SNRC की मान्यता और उसका आधार।
- विश्वविद्यालय की संबद्धता का आधार।
- 2024 और 2025 के प्रवेश आंकड़े।
- sanctioned seats और actual admissions।
- GNM से B.Sc. Nursing upgrade किए गए संस्थानों की स्थिति।
- न्यायालय में लंबित संस्थानों की सूची।
- 4 अप्रैल 2024 के आदेश का अनुपालन।
- 30 दिसंबर 2024 के SNRC निर्देश का अनुपालन।
- 4 अक्टूबर 2024 की विद्यार्थी सूचना का वास्तविक क्रियान्वयन।
- PNT और Percentile संबंधी सभी फाइलें।
- मंत्री की 21 नवंबर 2025 की नोटशीट का पूरा संदर्भ।
- 28 नवंबर 2025 के INC पत्राचार की फाइल।
- फीस और संबद्धता शुल्क से जुड़े आर्थिक रिकॉर्ड।
- यदि कोई आर्थिक अनियमितता है तो उसकी जांच।
सिस्टम को एक बात समझनी होगी—विद्यार्थी ‘डेटा’ नहीं है
किसी फाइल में 7811 सीटें लिखी हों या 4147 सीटें रिक्त हों, ये आंकड़े प्रशासन के लिए सिर्फ संख्या हो सकते हैं।
लेकिन हर सीट के पीछे एक इंसान है।
उसके पीछे एक परिवार है।
उसके पीछे किसी पिता की मेहनत है।
किसी मां की उम्मीद है।
किसी विद्यार्थी का सपना है कि वह नर्स बनेगा और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारेगा।
इसलिए सीट भरने के लिए नियमों में छूट देना और विद्यार्थी को सुरक्षित शिक्षा देना—दोनों एक बात नहीं हैं।
शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य सीट भरना नहीं, योग्य और सुरक्षित भविष्य तैयार करना होना चाहिए।
संपादकीय टिप्पणी: अब ‘पत्र’ नहीं, परिणाम चाहिए
पिछले वर्षों में इस मामले से जुड़े कई पत्र सामने आए।
कहीं मान्यता की बात हुई।
कहीं Suitability की।
कहीं छह माह की समय सीमा तय हुई।
कहीं विद्यार्थियों को चेतावनी दी गई।
कहीं admission date बढ़ाने की मांग हुई।
कहीं Percentile को लेकर राहत मांगी गई।
कहीं न्यायालयीन प्रकरणों का उल्लेख हुआ।
और अब शिकायत पर भी पत्र सामने आ गया।
लेकिन जनता का सवाल सरल है—
इन पत्रों से बदला क्या?
यदि गलत कॉलेज गलत तरीके से संचालित हो रहे हैं तो कार्रवाई कहां है?
यदि नियम टूटे हैं तो जिम्मेदार कौन है?
यदि विद्यार्थी जोखिम में हैं तो उन्हें सुरक्षा कौन देगा?
यदि आरोप गलत हैं तो शिकायतकर्ता को दस्तावेजों के साथ जवाब क्यों नहीं दिया जाता?
और यदि आरोप सही हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
अंतिम सवाल—क्या अब भी जांच उसी व्यवस्था से होगी?
यह संपादकीय किसी अधिकारी को अपराधी घोषित नहीं करता।
यह किसी कॉलेज को फर्जी घोषित नहीं करता।
यह किसी संस्था की वैधानिक स्थिति पर अंतिम फैसला भी नहीं सुनाता।
अंतिम फैसला सक्षम न्यायालय और वैधानिक नियामक संस्थाओं का ही होगा।
लेकिन दस्तावेजों और अब तक सामने आए पत्राचार से इतने सवाल जरूर पैदा होते हैं कि उन्हें केवल एक और सरकारी पत्र से शांत नहीं किया जा सकता।
सरकार को स्वतंत्र जांच करानी चाहिए।
यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है तो जांच में यही सामने आएगा।
यदि कहीं गंभीर अनियमितता है तो वह भी सामने आएगी।
लेकिन यदि शिकायतकर्ता की शिकायत का परीक्षण उसी प्रशासनिक व्यवस्था में घूमता रहेगा, जिस व्यवस्था के निर्णयों पर सवाल उठाए गए हैं, तो जनता के मन में यह सवाल बना रहेगा—
“जिस व्यवस्था पर सवाल है, उसी व्यवस्था से व्यवस्था की जांच कैसे?”
यही वह बिंदु है जहां शासन को फैसला करना है।
पत्राचार की फाइल बंद करनी है या सच की फाइल खोलनी है?
हजारों नर्सिंग विद्यार्थियों का भविष्य इस जवाब का इंतजार कर रहा है।
और 4thpiller.com का यह सवाल आज भी कायम है—
“नर्सिंग शिक्षा की व्यवस्था विद्यार्थियों के लिए है या व्यवस्था चलाने वालों के लिए?”
अब समय जवाब का नहीं, पारदर्शी जांच और ठोस कार्रवाई का है।









