प्रयागराज
कोर्ट की अवमानना से जुड़े एक मामले में की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अदालत पर मामलों के बोझ की बात कही है। कोर्ट का कहना है कि कार्यवाहियों को पूरा होने में समय लगता है, लेकिन इस दौरान पक्षों को अदालत के आदेशों के उल्लंघन की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने इसके खिलाफ सीधी चेतावनी दे दी है। याचिका पर सुनवाई कर रहे जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र ने कहा है कि कई बार अदालतों में एक दिन में 800 से ज्यादा केस आते हैं।
जस्टिस शैलेंद्र ने कहा, '“इलाहाबाद उच्च न्यायालय जैसे अत्यधिक बोझ से दबे संवैधानिक न्यायालयों में जहां हर दिन प्रत्येक न्यायाधीश के समक्ष लगभग 400, 500, 600 और कभी कभी 800 से अधिक मामले सूचीबद्ध होते हैं, न्यायिक कार्यवाही के निपटारे में काफी समय लग सकता है। कभी-कभी वर्ष और कभी-कभी दशक भी। फिर भी लोग ऐसे अत्यधिक कार्यभार वाले न्यायाधीशों से हमेशा काम करने वाले सुपर रोबोट, सुपर कंप्यूटर या सुपरह्यूमन बनने की उम्मीद करते हैं।'
दे दी चेतावनी
उन्होंने कहा कि न्यायिक कार्यवाही के निपटारे में समय लग सकता है। उन्होंने कहा कि इस लंबित प्रक्रिया के दौरान कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। जज ने कहा, 'कानून ऐसी हिम्मत को बर्दाश्त नहीं करता है।' उन्होंने यह भी कहा कि अगर ऐसी स्थिति की अनुमति दी गई, तो न्याय प्रशासन अराजकता में चला जाएगा।
क्या था मामला
दरअसल, कोर्ट एक अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी। आरोप थे कि शिक्षक की सैलरी से जुड़े आदेश को लागू नहीं किया गया था। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, गाजीपुर जिला विद्यालय निरीक्षक ने 18 अप्रैल 2022 को जारी एक आदेश को लागू नहीं किया था। इसपर राज्य ने कहा कि उनकी तरफ से कोर्ट के आदेश के खिलाफ एक आवेदन दिया गया है, जिसके चलते आदेश का पालन नहीं हुआ।
भड़क गया कोर्ट
अब राज्य की तरफ से मिले इस जवाब पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा है कि संवैधानिक अदालत का आदेश सिर्फ एडवाइजरी नहीं है और न ही सिर्फ कागज का टुकड़ा है, जिसे नजरअंदाज कर दिया जाए।
कोर्ट ने कहा, 'इसके साथ संविधान की पूरी शक्ति और कानून के शासन का गंभीर आदेश जुड़ा होता है। जिस पल मुकदमों में शामिल पक्षों को अदालती आदेशों को अपनी मर्जी या विकल्प के तौर पर मानने की छूट दे दी जाएगी, उसी पल संवैधानिक शासन की बुनियाद कमजोर होने लगेगी।'
कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी हुई है, वह तय नहीं कर सकता कि इसका पालन करना है या नहीं। बेंच ने कहा कि इस तरह के आवेदन अदालत के आदेश को कमजोर नहीं कर सकते।
महात्मा गांधी का किया जिक्र
कोर्ट ने कहा कि यह न्यायपालिका की अथॉरिटी पर हमला करने जैसा है। इ दौरान अदालत ने महात्मा गांधी 'My Experiments with Truth' का भी जिक्र किया।
उन्होंने कहा, 'महात्मा गांधी की एक मशहूर बात है, जो उन्होंने अपनी किताब 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' में लिखी थी कि 'आपकी इजाजत के बिना कोई आपका अपमान नहीं कर सकता।' यह बात कोर्ट की अवमानना के मामले में भी पूरी तरह लागू होती है। एक बड़े कोर्ट ने जो आदेश दे दिया, जब तक वह लागू है और रद्द नहीं हुआ है, तब तक उसे मानना ही पड़ेगा और उसका पूरा सम्मान करना होगा। अगर ऐसे आदेश को खुलेआम ताक पर रख दिया जाए और कोर्ट सिर्फ इसलिए चुप रह जाए या कोई कार्रवाई न करे क्योंकि उस आदेश को बदलने या हटाने की कोई अर्जी अभी कोर्ट के सामने पेंडिंग है, तो इससे कोर्ट की जो साख और ताकत कम होगी, उसके लिए सिर्फ आदेश तोड़ने वाला ही जिम्मेदार नहीं माना जाएगा।'
क्या हुआ फैसला
चार सालों तक आदेश लागू नहीं होने के मद्देनजर अदालत ने विद्यालय निरीक्षक को कोर्ट की अवमानना का दोषी पाया। साथ ही 8 जुलाई को आरोप तय किए जाने की बात कही है। कोर्ट ने कहा कि वह चाहें तो अभी भी साल 2022 के अदालती आदेश का पालन कर सकता है। वह ऐसा करके खुद को कोर्ट की अवमानना के आरोप से बचा सकता है।









