GNDU के VC और रजिस्ट्रार को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, अवमानना मामले में एक माह की कैद

चंडीगढ़

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया है। अदालत ने दोनों अधिकारियों को एक-एक महीने के कारावास की सजा सुनाई है। हालांकि, उन्हें तत्काल जेल भेजने के बजाय 7 जुलाई तक राहत प्रदान की गई है। इस अवधि में वे इस फैसले के खिलाफ डिवीजन बेंच में अपील दायर कर सकते हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय तक अपील दाखिल नहीं हुई या अपील पर सजा पर रोक नहीं मिली, तो अधिकारियों को सजा भुगतनी होगी। यह मामला विश्वविद्यालय के क्लास-4 और अन्य अस्थायी कर्मचारियों को नियमित किए जाने से जुड़ा है। वर्ष 2024 में हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। विश्वविद्यालय को नियमितीकरण प्रक्रिया लागू करने का आदेश दिया गया था।

अदालत ने माना था कि लंबे समय से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के मामले में विश्वविद्यालय को संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उस फैसले के खिलाफ कोई अपील दाखिल नहीं की। इसके बावजूद अदालत के आदेशों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया। कर्मचारियों का आरोप था कि विश्वविद्यालय ने जानबूझकर आदेश के पालन में देरी की। कई कर्मचारियों को अब भी नियमित नहीं किया गया है।

अदालत ने कई बार मांगी थी रिपोर्ट
इसके बाद प्रभावित कर्मचारियों की ओर से हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने विश्वविद्यालय प्रशासन से कई बार अनुपालन रिपोर्ट मांगी। लेकिन संतोषजनक कार्रवाई सामने नहीं आई। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि जब किसी फैसले को चुनौती नहीं दी गई, तब उसका पालन करना संबंधित अधिकारियों की कानूनी जिम्मेदारी बनती है। आदेश लागू न करना न्यायिक व्यवस्था की अवमानना है।

आदेश पालन में मानी लापरवाही
अदालत ने माना कि वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार ने आदेशों के पालन में गंभीर लापरवाही बरती। इसी आधार पर दोनों को अवमानना का दोषी ठहराया गया। उन्हें एक-एक माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई गई। यह फैसला न्यायिक आदेशों की गंभीरता को रेखांकित करता है। अधिकारियों को अदालत के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है।

सात जुलाई तक दाखिल कर सकेंगे अपील
सजा सुनाने के साथ ही हाईकोर्ट ने दोनों अधिकारियों को सीमित राहत भी दी है। अदालत ने कहा कि उन्हें 7 जुलाई तक अपील दाखिल करने की स्वतंत्रता रहेगी। इस अवधि में उनकी सजा पर रोक रहेगी। अब यदि डिवीजन बेंच से राहत नहीं मिलती है, तो विश्वविद्यालय के दोनों शीर्ष अधिकारियों को जेल जाना पड़ सकता है। यह मामला न्यायिक आदेशों के सम्मान का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

 

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