क्या लोकतंत्र में असहमति “परजीविता” है? – अब्दुल शेख़ करीम

न्यायपालिका की भाषा, लोकतंत्र की आत्मा और नागरिकों की चिंता

लेखक: अब्दुल शेख़ करीम

(एक स्वतंत्र पत्रकार एवं RTI व सामाजिक कार्यकर्त्ता)

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्थाएं रही हैं। संसद, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज—ये सभी मिलकर उस लोकतांत्रिक ढांचे को जीवित रखते हैं, जिसकी नींव संविधान निर्माताओं ने रखी थी। लेकिन जब इन्हीं संस्थाओं के शीर्ष पदों से ऐसी टिप्पणियाँ सामने आने लगें, जिनमें बेरोज़गार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडिया या असहमति व्यक्त करने वाले नागरिकों के प्रति तिरस्कार की झलक दिखाई दे, तब सवाल केवल एक बयान का नहीं रह जाता; वह लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।

हाल के दिनों में देश की न्यायपालिका से जुड़े कुछ सार्वजनिक वक्तव्यों ने एक व्यापक बहस को जन्म दिया है। बहस केवल शब्दों की नहीं है, बल्कि उस सोच की है जो उन शब्दों के पीछे दिखाई देती है। जब संवैधानिक पदों पर बैठे लोग नागरिकों की पीड़ा, आक्रोश और सवालों को “परजीवी”, “प्रदूषण” या “अनावश्यक शोर” की तरह देखने लगें, तब यह चिंता स्वाभाविक हो जाती है कि लोकतंत्र की संस्थाएँ आखिर किसके लिए हैं—सत्ता की सुविधा के लिए या जनता की आवाज़ के लिए?

लोकतंत्र में भाषा केवल भाषा नहीं होती

लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रमुख जब बोलते हैं, तो उनके शब्द केवल व्यक्तिगत राय नहीं होते। वे संस्था की संवैधानिक गरिमा और उसके नैतिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए न्यायपालिका की भाषा को हमेशा संयमित, संतुलित और संवेदनशील माना गया है।

भारत के न्यायिक इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जब न्यायालयों ने अपने फैसलों और टिप्पणियों के माध्यम से लोकतंत्र को मजबूत किया। अदालतों ने सरकारों को याद दिलाया कि आलोचना देशद्रोह नहीं होती, असहमति लोकतंत्र की आत्मा है और नागरिकों को प्रश्न पूछने का अधिकार है। यही कारण है कि आम नागरिक अदालतों को केवल कानून की संस्था नहीं, बल्कि अंतिम नैतिक आशा के रूप में भी देखते हैं।

लेकिन जब न्यायपालिका के भीतर से ऐसी भाषा सामने आती है, जो नागरिकों के एक बड़े वर्ग को संदेह या उपहास की दृष्टि से देखती प्रतीत हो, तब यह विश्वास कमजोर होने लगता है।

बेरोज़गार युवा: व्यवस्था की विफलता या “परजीवी”?

आज भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। लेकिन यही युवा वर्ग बेरोज़गारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक, संविदा व्यवस्था, अस्थायी नौकरियों और बढ़ती आर्थिक असुरक्षा से जूझ रहा है।

करोड़ों शिक्षित युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। परिवार कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। कई युवा उम्र सीमा पार कर जाते हैं। कुछ अवसाद में चले जाते हैं। अनेक आत्महत्या तक कर लेते हैं। यह केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक संकट भी है।

ऐसे समय में यदि बेरोज़गार युवाओं के आक्रोश को “परजीवी मानसिकता” या “अनुत्पादक असंतोष” की तरह प्रस्तुत किया जाए, तो यह उन लाखों संघर्षरत परिवारों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा प्रतीत होता है। सवाल यह नहीं कि किसी ने कौन-सा शब्द इस्तेमाल किया; सवाल यह है कि क्या व्यवस्था उन युवाओं की वास्तविक पीड़ा को समझने की कोशिश कर रही है?

एक लोकतांत्रिक समाज में बेरोज़गार युवा समस्या नहीं होते, बल्कि व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी होते हैं। उन्हें अपमानित करना समाधान नहीं हो सकता।

आरटीआई कार्यकर्ता: लोकतंत्र के प्रहरी या व्यवस्था के लिए असुविधा?

सूचना का अधिकार कानून भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है। इस कानून ने आम नागरिक को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार दिया। गाँव के राशन घोटाले से लेकर बड़े स्तर के भ्रष्टाचार तक, अनेक मामलों का खुलासा आरटीआई कार्यकर्ताओं ने किया।

लेकिन इसके लिए उन्हें भारी कीमत भी चुकानी पड़ी। देश में कई आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले हुए, कई की हत्या तक कर दी गई। फिर भी वे पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए लड़ते रहे।

ऐसे लोगों को संदेह की दृष्टि से देखना या उन्हें “व्यवस्था विरोधी तत्व” की तरह प्रस्तुत करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। लोकतंत्र में पारदर्शिता कोई अपराध नहीं होती। सवाल पूछना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।

यदि संस्थाएँ आलोचना को सहयोगी प्रक्रिया के बजाय शत्रुता मानने लगें, तो धीरे-धीरे लोकतंत्र “जवाबदेह शासन” से “असहज प्रश्नों से भयभीत शासन” में बदलने लगता है।

मीडिया की भूमिका और बढ़ता अविश्वास

यह सच है कि मीडिया के एक हिस्से पर पक्षपात, सनसनी और कॉर्पोरेट प्रभाव के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आज भी अनेक पत्रकार कठिन परिस्थितियों में जमीन पर जाकर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। कई पत्रकारों ने भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलताओं और मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर किया है।

लोकतंत्र में मीडिया का काम केवल सरकार की उपलब्धियाँ दिखाना नहीं होता; उसका काम सवाल पूछना भी होता है। यदि पत्रकारिता केवल “जी हाँ हुजूर” तक सीमित हो जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रचारतंत्र में बदल जाता है।

इसलिए जब मीडिया या सोशल मीडिया पर उठने वाली आलोचनात्मक आवाज़ों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, तब चिंता स्वाभाविक होती है। आलोचना और दुष्प्रचार के बीच अंतर अवश्य होना चाहिए, लेकिन असहमति को अपराध की तरह देखना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।

न्यायपालिका की गरिमा उसकी शक्ति नहीं, उसका संयम है

न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी नैतिक विश्वसनीयता होती है। अदालत के पास सेना नहीं होती, पुलिस नहीं होती, राजनीतिक शक्ति नहीं होती। उसकी असली शक्ति जनता का विश्वास होता है।

यह विश्वास केवल फैसलों से नहीं बनता, बल्कि न्यायाधीशों के सार्वजनिक आचरण और भाषा से भी बनता है। इसलिए न्यायिक मर्यादा हमेशा भारतीय न्याय व्यवस्था की मूल पहचान रही है।

एक न्यायाधीश को आलोचना से ऊपर नहीं माना जाता। लोकतंत्र में हर संस्था जवाबदेह होती है। लेकिन जनता न्यायपालिका से यह अपेक्षा अवश्य करती है कि वह राजनीतिक भाषा या उपहासपूर्ण शैली से दूरी बनाए रखेगी।

जब अदालतें संयमित भाषा का प्रयोग करती हैं, तो समाज में संवाद का स्तर ऊँचा होता है। लेकिन जब सार्वजनिक विमर्श में कठोरता, व्यंग्य और तिरस्कार बढ़ता है, तो उसका असर संस्थाओं की प्रतिष्ठा पर भी पड़ता है।

क्या असहमति राष्ट्रविरोध है?

भारतीय संविधान ने नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। यह स्वतंत्रता केवल सरकार की प्रशंसा करने के लिए नहीं है; यह असहमति व्यक्त करने के लिए भी है।

भारत का लोकतंत्र इसलिए मजबूत माना जाता है क्योंकि यहाँ नागरिक सरकार, संसद, मीडिया और यहाँ तक कि न्यायपालिका पर भी सवाल उठा सकते हैं। अदालतों ने स्वयं कई ऐतिहासिक फैसलों में कहा है कि लोकतंत्र में आलोचना लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का संकेत है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति बढ़ी है कि असहमति को “राष्ट्रविरोध”, “अराजकता” या “नकारात्मकता” के रूप में चित्रित किया जाने लगा है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले नागरिक दुश्मन नहीं होते। वे वही लोग होते हैं जो व्यवस्था को बेहतर बनाना चाहते हैं।

सोशल मीडिया, अभिव्यक्ति और संस्थागत असहजता

सोशल मीडिया ने नागरिकों को अपनी बात रखने का नया मंच दिया है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं। फेक न्यूज, ट्रोलिंग और दुष्प्रचार वास्तविक समस्याएँ हैं। लेकिन इसी सोशल मीडिया ने अनेक अन्यायों को उजागर भी किया है।

यदि सोशल मीडिया पर की गई हर आलोचना को “संस्था विरोधी गतिविधि” मान लिया जाए, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता गंभीर संकट में पड़ सकती है।

लोकतंत्र में संस्थाओं को आलोचना सहने की क्षमता रखनी पड़ती है। मजबूत संस्थाएँ सवालों से डरती नहीं, बल्कि पारदर्शिता के माध्यम से जवाब देती हैं।

न्यायपालिका और जनता के बीच बढ़ती दूरी

आज आम नागरिक के मन में कई प्रश्न हैं। न्याय में देरी, लंबित मामलों का बोझ, महंगी कानूनी प्रक्रिया, संवेदनशील मामलों में विरोधाभासी टिप्पणियाँ—इन सबने न्यायपालिका को लेकर बहस को जन्म दिया है।

विश्व स्तर पर भी भारतीय न्याय व्यवस्था की कार्यक्षमता और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे समय में न्यायपालिका से अपेक्षा थी कि वह जनता के साथ संवाद में और अधिक संवेदनशील दिखाई देगी।

लेकिन यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि उनकी पीड़ा को समझने के बजाय उन्हें ही संदेह की नजर से देखा जा रहा है, तो संस्थागत दूरी और बढ़ेगी।

लोकतंत्र में विनम्रता क्यों आवश्यक है?

संवैधानिक पद व्यक्ति को शक्ति देते हैं, लेकिन साथ ही बड़ी नैतिक जिम्मेदारी भी देते हैं। लोकतंत्र में कोई भी संस्था आलोचना से परे नहीं हो सकती।

विनम्रता लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। जब संस्थाएँ अपनी सीमाओं को स्वीकार करती हैं, तब जनता का विश्वास बढ़ता है। लेकिन जब आलोचना को अपमान समझा जाने लगे, तब संवाद टूटने लगता है।

इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र आलोचना से नहीं टूटते; लोकतंत्र तब कमजोर होते हैं जब सत्ता और संस्थाएँ खुद को जनता से ऊपर मानने लगती हैं।

आखिर जनता चाहती क्या है?

देश का आम नागरिक न्यायपालिका से केवल कानून की व्याख्या नहीं चाहता। वह संवेदनशीलता चाहता है। वह यह भरोसा चाहता है कि अदालतें उसकी आवाज़ सुनेंगी, चाहे वह गरीब हो, बेरोज़गार हो, पत्रकार हो, छात्र हो या आरटीआई कार्यकर्ता।

युवा रोजगार चाहते हैं, अपमान नहीं।
पत्रकार स्वतंत्रता चाहते हैं, भय नहीं।
आरटीआई कार्यकर्ता पारदर्शिता चाहते हैं, संदेह नहीं।
नागरिक सम्मान चाहते हैं, तिरस्कार नहीं।

संस्थाओं की शक्ति जनता के विश्वास से आती है

भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी विविधता, बहस और असहमति में है। यहाँ नागरिक सवाल पूछते हैं, बहस करते हैं और संस्थाओं से जवाब मांगते हैं। यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

न्यायपालिका इस लोकतांत्रिक ढांचे की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। इसलिए उससे अपेक्षा भी सबसे अधिक होती है। अदालतें केवल कानूनी संस्थाएँ नहीं हैं; वे संविधान की नैतिक आत्मा का प्रतिनिधित्व करती हैं।

ऐसे समय में जब समाज पहले से ही राजनीतिक ध्रुवीकरण और सामाजिक तनाव से गुजर रहा है, न्यायपालिका की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उसे वह स्थान बने रहना होगा जहाँ नागरिक बिना भय के न्याय और सम्मान की उम्मीद लेकर जा सकें।

लोकतंत्र में आलोचना दुश्मनी नहीं होती। सवाल पूछना अपराध नहीं होता। असहमति राष्ट्रविरोध नहीं होती। और बेरोज़गार युवा, आरटीआई कार्यकर्ता, पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता—ये लोकतंत्र के “परजीवी” नहीं, बल्कि उसकी जीवित चेतना हैं।

संस्थाएँ जितनी बड़ी होती हैं, उनसे उतनी ही अधिक संवेदनशीलता, विनम्रता और मर्यादा की अपेक्षा की जाती है। क्योंकि अंततः लोकतंत्र कानूनों से नहीं, विश्वास से चलता है—और विश्वास शब्दों से भी बनता है, और शब्दों से ही टूटता भी है।

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