रांची
झारखंड की क्षेत्रीय राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय पहचान बनाने की दिशा में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने निर्णायक कदम बढ़ा दिया है। अप्रैल, 2025 को रांची में आयोजित पार्टी के 13वें महाधिवेशन में पारित अपने राजनीतिक प्रस्ताव से साफ संकेत दिया कि झामुमो की प्राथमिकता अब सिर्फ राज्य नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार है। पार्टी संगठन केंद्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में नई रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। यह प्रस्ताव धरातल पर मजबूती के साथ दिखने भी लगा है। इस कड़ी में दिल्ली में संपर्क कार्यालय, अन्य राज्यों में संगठन को मजबूत करने की दिशा में ठोस पहल तथा बिहार, असम, ओडिशा और बंगाल जैसे राज्यों के लक्षित हिस्सों को मिलाकर बृहद झारखंड की परिकल्पना झामुमो की रणनीति का हिस्सा हैं।
बिहार से मिला सबक, गठबंधन राजनीति की चुनौती
राष्ट्रीय विस्तार की इस रणनीति की पहली परीक्षा बिहार विधानसभा चुनाव में दिखी। झामुमो ने महागठबंधन के तहत चुनाव लड़ने की तैयारी की थी, लेकिन सीट बंटवारे पर राजद और कांग्रेस के साथ अंतिम समय तक सहमति नहीं बन सकी। झामुमो ने सम्मानजनक सीटों की मांग की थी, पर ससमय निर्णय नहीं हुआ। लिहाजा, बिहार चुनाव से झामुमो को दूर रहना पड़ा। यह झामुमो के लिए बड़ा सबक रहा।
असम में आक्रामक रणनीति, ‘तीर-धनुष’ के साथ मैदान में
बिहार के अनुभव से सबक लेते हुए झामुमो ने असम में समय रहते चुनाव आयोग से अपना चुनाव चिह्न ‘तीर-धनुष’ हासिल किया और स्थानीय स्तर पर संगठन भी सक्रिय किया। यहां रिजल्ट आने में अभी देरी है लेकिन हेमंत सोरेन ने 16 सीटों पर चुनाव लड़ स्पष्ट संदेश दिया कि पार्टी ने राष्ट्रीय फलक पर विस्तार की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। प्रचार के दौरान पूरी रणनीति के साथ धुआंधार रैलियां की और टी-ट्राइब को जनजाति का दर्जा दिलाने समेत अन्य मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। झामुमो मानता है कि उसकी मौजूदगी से भाजपा के आदिवासी वोट बैंक में सेंधमारी हो सकती है।
बंगाल में रणनीतिक समर्थन, टीएमसी के साथ तालमेल
बंगाल में हेमंत ने राजनीतिक सूझबूझ और परिपक्वता का परिचय देते हुए अपने उम्मीदवार नहीं उतारे, बल्कि ममता बनर्जी का हाथ मजबूत करने का निर्णय लिया। हेमंत ने टीएमसी के पक्ष में प्रचार कर भाजपा विरोधी राजनीति को मजबूत किया। कल्पना सोरेन ने भी आदिवासी बहुल सीटों पर प्रचार किया। यह रणनीति झामुमो के उस व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसके तहत खुद को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का धुर विरोधी के रूप में स्थापित करना है।
पार्टी भविष्य में छत्तीसगढ़ और अन्य प्रदेशों में करेगी विस्तार
झामुमो की राजनीति का मूल आधार झारखंड के आदिवासी, मूलवासी, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, किसान और मजदूर रहे हैं। पार्टी अब इसी सामाजिक गठजोड़ को राष्ट्रीय स्तर पर दोहराना चाहती है। पार्टी संगठन हेमंत की छवि को भी इसी रणनीति के तहत राष्ट्रीय स्तर पर उभार रहा है। आदिवासी समाज से जुड़े चिंतकों का मानना है कि हेमंत आज देश के सबसे बड़े और लोकप्रिय ट्राइबल लीडर के रूप में स्वीकार किए जा रहे हैं और भाजपा के खिलाफ मजबूती से खड़े हैं। झामुमो महासचिव विनोद पांडेय के अनुसार, पार्टी भविष्य में छत्तीसगढ़ समेत अन्य प्रदेशों में विस्तार को लेकर रणनीति बना रही है।
भाजपा के खिलाफ वैचारिक लड़ाई
झामुमो ने अपने राजनीतिक प्रस्ताव में भाजपा को मुख्य वैचारिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में चिह्नित किया है। पार्टी का मानना है कि देश में सामाजिक विभाजन और भय का माहौल बनाया जा रहा है, जिसके खिलाफ आदिवासी और वंचित वर्गों को एकजुट करना जरूरी है। झामुमो की जड़ें 1970 के दशक के उस आंदोलन से जुड़ी हैं, जब 1972-73 के आसपास अलग झारखंड और सामाजिक न्याय की विचारधारा के साथ पार्टी का गठन हुआ। समाजवादी सोच को आगे बढ़ाने में एके राय और शिबू सोरेन जैसे नेताओं की अहम भूमिका रही।
आगे की राह: क्या है अवसर और कौन सी हैं चुनौतियां
झामुमो को राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए न केवल नए राज्यों में संगठन खड़ा करना है, बल्कि गठबंधन राजनीति की जटिलताओं से भी जूझना है। असम में सक्रिय भागीदारी और बंगाल में रणनीतिक समर्थन से पार्टी ने संकेत दिया है कि वह लचीली, लेकिन स्पष्ट रणनीति के साथ आगे बढ़ना चाहती है। इतना तय है कि झामुमो ने अपनी राजनीतिक दिशा स्पष्ट कर दी है- झारखंड के बाद उनका अगला पड़ाव दिल्ली है।









