नई दिल्ली
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को दावोस में बोर्ड ऑफ पीस के गठन का ऐलान कर दिया। उनकी ओर से इसका जो प्रस्ताव दिखाया गया, उसमें 8 मुसलमान मुल्कों समेत कई देशों की ओर से सहमति का पत्र था। गाजा को फिर से खड़ा करने के लिए तैयार इस बोर्ड को लेकर मुसलमान देश तो जुड़ गए हैं, लेकिन यूरोपियन यूनियन के देश हिचक रहे हैं। इसके अलावा भारत, रूस और चीन जैसे बड़े देशों ने भी अब तक इससे दूरी ही बनाकर रखी है। इस बीच सवाल है कि आखिर भारत की इस संबंध में क्या रणनीति है और वह डोनाल्ड ट्रंप के इस प्रोजेक्ट से जुड़ने से हिचक क्यों रहा है। इसकी तीन वजहें हैं।
पहला कारण तो यही है कि भारत की नीति देखो और इंतजार करो की है। भारत चाहता है कि पहले यह देखा जाए कि दुनिया के कौन-कौन से देश इससे जुड़ने को तैयार हैं। अब तक रूस और चीन इसका हिस्सा नहीं बने हैं। इसके अलावा फ्रांस, इटली और ब्रिटेन जैसे देश भी दूर ही हैं। ऐसी स्थिति में भारत नहीं चाहता कि वह आगे बढ़कर इसकी मेंबरशिप ले। इसके अलावा गाजा का मसला भारत की आंतरिक राजनीति के लिहाज से भी संवेदनशील रहा है। इसीलिए भारत तुरंत इससे जुड़ने से बच रहा है और फिलहाल इंतजार करने के मूड में है।
UN को कमजोर होते नहीं देखना चाहते ये देश
दूसरा कारण, अब तक इस समूह से इजरायल, जॉर्डन, इंडोनेशिया, मिस्र, बुल्गारिया, बेलारूस, कजाखस्तान, कोसोवो, मोरक्को, मंगोलिया, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात जुड़े हैं। ये ज्यादातर ऐसे देश हैं, जो इस्लामी मुल्क हैं। गाजा में शांति और वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कराने में इनकी दिलचस्पी है। लेकिन यूरोप के देश तो दूर ही रहे हैं। असल में इसकी वजह यह है कि अमेरिका के करीबी रहे यूरोप के देशों को भी डर है कि कहीं अमेरिका का ही वर्चस्व ना हो जाए। विशेष तौर पर संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने वाले डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने भी आशंकाएं बढ़ा दी हैं। कोई देश नहीं चाहता कि यूएन जैसे बहुदेशीय संगठन की जगह अमेरिका के एकतरफा वर्चस्व वाले बोर्ड ऑफ पीस को ताकत मिले।
डोनाल्ड ट्रंप हट जाएंगे तो बोर्ड ऑफ पीस का क्या होगा?
तीसरा यह कि इसके अलावा बोर्ड ऑफ पीस के भविष्य को लेकर भी भारत में चिंता है। वजह यह कि डोनाल्ड ट्रंप इसके लिए जुनून रखते हैं, लेकिन उनके राष्ट्रपति पद से हटने के बाद इसका भविष्य क्या रहेगा। इसे लेकर अनिश्चितता की स्थिति है। डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल तो तीन साल के बाद खत्म हो जाएगा। इसके अलावा डोनाल्ड ट्रंप की विश्वसनीयता को लेकर भी भारत में चिंताएं हैं। भारत ने हमेशा ही संयुक्त राष्ट्र संघ और बहुपक्षीयवाद को महत्व दिया है। ऐसे में भारत नहीं चाहता कि डोनाल्ड ट्रंप की पहल शुरू हुआ कोई संगठन संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने की स्थिति में आए।









