SCERT का बड़ा खेल: हाईकोर्ट में लंबित प्रकरणों के बावजूद 146 कॉलेजों में सीटों का बंटवारा, छात्रों का भविष्य दांव पर!
🟥 “विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर – SCERT के विवादित आदेशों की जिम्मेदारी कौन लेगा?” 🟥
रायपुर।
शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की बात करने वाली सरकार और उसकी एजेंसियों पर अब सवालों का बवंडर खड़ा हो गया है। हाल ही में जारी 10 पन्नों का आदेश, जिसमें 146 महाविद्यालयों को B.Ed सीटों का आबंटन किया गया है, गहरी अनियमितताओं की पोल खोल रहा है।
🚨 हाईकोर्ट में लंबित प्रकरण, फिर भी सीटों का बंटवारा!
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, सरल क्रमांक 14, 78, 84 और 127 वाले कॉलेजों का मामला मान्यता को लेकर हाईकोर्ट में अंतिम निर्णय हेतु लंबित है। ऐसे में सवाल उठता है कि —
👉 जब मामला न्यायालय में लंबित है, तो SCERT को इन कॉलेजों में प्रवेश का आदेश देने की अनुमति किसने दी ?
👉 अगर हाईकोर्ट का फैसला इन कॉलेजों के विरुद्ध आया तो उन छात्रों का क्या होगा जिन्हें यहाँ एडमिशन दिलाया गया ?
👉 क्या SCERT विद्यार्थियों का साल व भविष्य खराब होने का मुआवजा देगा ?
❌ गलत जानकारी और दबाव व भ्रस्टाचार की बू
नोट क्रमांक 1 और 3 में SCERT द्वारा दी गई जानकारी को गलत बताया जा रहा है।
नोट 1: निजी विश्वविद्यालयों की फीस अभी तक प्रवेश एवं फीस विनियामक समिति ने तय ही नहीं की है।
नोट 3: SCERT यह दावा कर रहा है कि माननीय उच्च न्यायालय ने इन कॉलेजों को काउंसलिंग में सम्मिलित करने का निर्देश दिया है।
नोट 4: SCERT पर सवाल यह है कि क्या सचमुच कोर्ट ने ऐसा आदेश दिया था या यह सिर्फ “फेवर” करने का एक और बहाना है ?
❓ आखिर किसके दबाव में काम कर रहे हैं संचालक ऋतुराज रघुवंशी ?
SCERT रायपुर के संचालक ऋतुराज रघुवंशी पर सीधा आरोप है कि वे इक्छा विरुद्ध बेमन से पद में विराजमान हैं जिसके चलते या दबाव या अधीनस्थ अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के चलते विवादित आदेश जारी कर रहे हैं।
यह भी आरोप है कि ऐसे आदेशों को “भ्रष्टाचार की सीढ़ी” मान लिया गया है, जहाँ छात्रों के भविष्य की कीमत पर अधिकारी लाखों-करोड़ों कमाने का अवसर देख रहे हैं।
⚖️ क्या मंत्री और जांच एजेंसियाँ करेंगी ठोस कार्रवाई ?
अब सवाल उठ रहा है —
👉 क्या शिक्षा मंत्री और शासन के IAS अफसरों में इतनी हिम्मत है कि इस मामले पर सख्त कार्रवाई करेंगे ?
👉 क्या EOW और ACB अब तक इसलिए चुप हैं क्योंकि उन्हें भी इस “सेटिंग” का हिस्सा बनाया गया है ?
👉 क्यों हर गंभीर मामला “जांच के नाम पर” दफ्तरों की फाइलों में दम तोड़ देता है ?
👉 क्यों मंत्री मुख्यमंत्री शासन या प्रशासन में बैठें लोग समाचारों के माध्यम से प्राप्त ऐसे गंभीर मामलों को स्व-संज्ञान में लेते हुवे कड़ी कार्यवाही नहीं करतें हैं।
🗣️ अब जनता को चुप्पी तोड़नी होगी, नहीं तो होनहार विद्यार्थियों का भविष्य होगा ख़राब
पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते मैं इस मुद्दे को उजागर कर रहा हूँ। पर अब यह ज़िम्मेदारी सिर्फ मेरी नहीं है।
👉 विद्यार्थियों, अभिभावकों और छात्र संगठनों को चाहिए कि इस भ्रष्टाचार के खिलाफ सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर आवाज उठाएँ।
👉 अगर आप खामोश रहे, तो अधिकारी और संस्थान आपकी चुप्पी को अपनी “इजाज़त” मान लेंगे।
सबसे बड़ा सवाल
“क्या अब भी सरकार सोती रहेगी ?”
क्या मंत्री और सरकार इस गंभीर मुद्दे पर सिर्फ बयान देंगे या फिर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई भी करेंगे ?
अब जनता की निगाहें शासन, न्यायपालिका और जांच एजेंसियों पर टिकी हैं।
📦 संचालक महोदय से सीधा निवेदन/सवाल 📦
संचालक श्री ऋतुराज रघुवंशी जी से निवेदन है कि किसी भी आदेश पर हस्ताक्षर करने से पहले सभी तथ्यों की गंभीरता से जाँच-पड़ताल कर लें। यदि फ़ाइल प्रस्तुत करने वाले अधिकारी की लापरवाही या गलती सामने आती है, तो उसके खिलाफ कड़ी और बड़ी कार्यवाही होनी चाहिए।
वर्तमान आदेश में न्यायालय में विचाराधीन महाविद्यालयों को B.Ed. सीटों का आबंटन किया गया है – यह गंभीर चूक है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसी फ़ाइल पेश करने वाले अधिकारी ने क्यों और किस दबाव में ऐसा किया।
👉 यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का शक भी गहरा करता है।
👉 संचालक का पद राज्य स्तरीय गरिमा से जुड़ा है, ऐसे आदेश उस गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं।
👉 जिन विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है, उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा ?
यदि माननीय उच्च न्यायालय इन महाविद्यालयों के पंजीयन को निरस्त कर देता है तो उन छात्रों का साल और करियर कौन लौटाएगा ?