मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मार्फ़नी: वह देशभक्त, जिसने अपना सब कुछ हिंदुस्तान की आज़ादी के नाम कर दिया
लेखक विशेष – स्वतंत्रता दिवस 2025 के अवसर पर
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परिचय और जीवनी
मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मार्फ़नी का नाम शायद बहुत से लोगों ने आज न सुना हो, लेकिन आज़ादी के दौर में उनका योगदान इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज है। वे एक प्रसिद्ध व्यापारी, समाजसेवी और बेमिसाल देशभक्त थे, जिनका जन्म गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में एक समृद्ध व्यापारी परिवार में हुआ था।
व्यवसाय में सफलता के साथ उनका मन हमेशा समाजसेवा और राष्ट्रहित के कार्यों में लगा रहता था। वे मानते थे कि धन तभी सार्थक है, जब वह जरूरतमंदों, समाज और देश की भलाई के लिए खर्च किया जाए।
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आज़ादी के लिए उनका जज़्बा
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जब स्वतंत्रता संग्राम अपनी चरम पर था, उस समय देश को न केवल साहस और बलिदान की ज़रूरत थी, बल्कि आर्थिक मदद की भी आवश्यकता थी।
मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मार्फ़नी ने इस पुकार को दिल से महसूस किया और आज़ादी के आंदोलन को मजबूती देने के लिए अपना पूरा समर्थन दिया।
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ऐतिहासिक दान का वाक्या
साल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान और महात्मा गांधी के राष्ट्र निर्माण के संदेश से प्रेरित होकर, मार्फ़नी साहब ने एक लाख एक हजार रुपए (₹1,01,000) का दान तत्कालीन कांग्रेस को दिया।
यह रकम उस दौर में एक बेहद बड़ी राशि थी। कहा जाता है कि जब उन्होंने यह दान दिया, तब कई लोग चौंक गए, क्योंकि इतनी बड़ी रकम दान करना सिर्फ पैसे का त्याग नहीं था, बल्कि अपने परिवार के आर्थिक भविष्य को भी दांव पर लगाना था।
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आज की तारीख में उस दान की कीमत
अगर 1942 के ₹1,01,000 को आज के मूल्य में देखा जाए, तो इसकी गणना महंगाई दर, स्वर्ण मूल्य और मुद्रा अवमूल्यन को मिलाकर की जा सकती है।
1942 में 10 ग्राम सोने की कीमत लगभग ₹88 थी।
₹1,01,000 में उस समय लगभग 11.47 किलो सोना आता था।
2025 में 10 ग्राम सोना लगभग ₹73,000 के आसपास है।
गणना:
11.47 किलो = 11,470 ग्राम
11,470 ÷ 10 = 1,147 × ₹73,000 = ₹83,73,10,000 (लगभग 83.73 करोड़ रुपये)
यानि, मार्फ़नी साहब का वह दान आज के समय में 80 करोड़ रुपये से ज्यादा के बराबर है।
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धर्म से ऊपर उठकर देशभक्ति का संदेश
मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मार्फ़नी का यह त्याग इस बात का प्रमाण है कि हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई में हर धर्म, हर जाति, हर तबके के लोग कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे।
वे मुसलमान थे, लेकिन उनकी पहचान सबसे पहले एक हिंदुस्तानी की थी। उन्होंने अपने धर्म को कभी राष्ट्र के हित के विपरीत नहीं रखा, बल्कि इस सोच को मज़बूत किया कि “धर्म व्यक्तिगत है, देश सर्वोपरि है।”
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आज के परिवेश में सीख
दुर्भाग्य से, आज के राजनीतिक माहौल में कुछ नेता और समूह देश के नागरिकों को जाति और धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश कर रहे हैं। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नकारात्मक भावनाएँ और हीन भावना फैलाने का काम किया जा रहा है — कभी “वोट बैंक” के नाम पर, तो कभी “राष्ट्रवाद” के नाम पर।
ऐसे में मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मार्फ़नी की कहानी हमें याद दिलाती है कि असली देशभक्ति जाति-धर्म से ऊपर उठकर ही संभव है। अगर आज भी हम उनके त्याग और सोच को अपनाएँ, तो देश में एकता, भाईचारा और विश्वास का माहौल बनेगा।
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निष्कर्ष
मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मार्फ़नी सिर्फ एक दानवीर नहीं थे, बल्कि उस दौर के उन गुमनाम नायकों में से एक थे, जिनकी निष्ठा, त्याग और देशभक्ति आज के भारत के लिए मिसाल है।
स्वतंत्रता दिवस पर जब हम तिरंगा लहराएँ, तो हमें याद रखना चाहिए कि यह आज़ादी उन लोगों की देन है, जिन्होंने धर्म और जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर अपना सब कुछ देश पर न्यौछावर कर दिया।