IAS IPS अफसरों की पारदर्शिता बनाम IFS अधिकारियों की अघोषित दौलत: वन विभाग में ‘हरियाली’ कुछ ज़्यादा ही है?

छत्तीसगढ़ में हाल ही में IPS के बाद IAS अधिकारियों की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक हुआ, जिससे राज्य प्रशासन में पारदर्शिता की दिशा में एक सराहनीय पहल सामने आई है। ऑनलाइन पोर्टल पर घोषित संपत्तियों के अनुसार, अधिकांश वरिष्ठ IAS अफसरों की संपत्तियां 1 से 5 करोड़ के बीच हैं, और कुछ अफसरों के पास सिर्फ एक अचल संपत्ति है। यह एक तरह से एक उदाहरण है कि पारदर्शिता की नीति को कैसे अपनाया जा सकता है।

IAS की पारदर्शिता: 30 साल नौकरी फिर भी 2–5 करोड़ की संपत्ति

1989 बैच के अर्पित जैन हों या 1994 बैच की प्रियंका शुक्ला, इन अफसरों की घोषित संपत्ति 1.5 से 2.5 करोड़ के बीच है। टोपेश्वर वर्मा के पास भले ही 12.4 करोड़ की एकल संपत्ति है, लेकिन वह घोषित है और सिस्टम के भीतर पारदर्शिता के साथ रजिस्टर में दर्ज है। अमित कटारिया जैसे अफसरों ने 46 करोड़ की संपत्ति घोषित की है, परंतु यह सब इनकम टैक्स रिकॉर्ड में दर्ज है।

IFS अफसरों के बंगले में ‘कैश की खेती’?

लेकिन अगर नजर वन विभाग की ओर घुमाई जाए, तो तस्वीर एकदम अलग दिखाई देती है। विभागीय सूत्रों की मानें, तो कुछ IFS अधिकारी ऐसे हैं जिनकी संपत्तियां IAS IPS अफसरों से कई गुना अधिक हैं — पर यह सब बिना किसी घोषणा और पारदर्शिता के। एक 2015 बैच के IFS अधिकारी के सुकमा/रायगढ़/रायपुर स्थित सरकारी बंगले में ACB ने कुछ माह पूर्व छापेमारी की, जहाँ 20 लाख रुपए नकद और 95 संपत्तियों के दस्तावेज बरामद किए गए। सवाल यह है कि 9–10 साल की सेवा में कोई अधिकारी इतनी संपत्ति कैसे जमा करता है?

DFO के बंगले में भी ‘कैश का जंगल’

सूत्रों का कहना है कि अभी मार्च एकाउंट ख़त्म हुवा है यदि अभी तुरंत सूरजपुर, बलरामपुर, सरगुजा, कोरबा, मरवाही, मुंगेली, जांजगीर, चांपा, गुरुघासीदास और तमोर पिंगला जैसे बड़े वनमंडलों के DFO को अगर आज ही जांच के घेरे में ले लिया जाएं, तो एक-एक बंगले से 4–5 करोड़ नकद मिलने की संभावना है। इतना ही नहीं, अरण्य भवन नवा रायपुर के मुख्य द्वार पर खड़े होकर यदि ACB और EOW ईमानदारी से निगरानी करें, तो 35 से 65 लाख रुपए की अटैचियाँ भीतर जाती साफ नजर आ सकती हैं।

“10 IFS के नाम अभी दे सकता हूं”: विभागीय सूत्र का दावा

वन विभाग के एक जानकार का दावा है कि वह ACB और EOW को कम से कम 10 ऐसे IFS अफसरों के नाम दे सकता है, जिनकी काली कमाई सीधे वनमंडलों से आती है। यहाँ तक कि अरण्य भवन में पदस्थ 3 IFS ऐसे हैं जो एक वनमंडल से 35 से 65 लाख रुपए तक की राशि ‘मैनेज’ कर रहे हैं।

तो सवाल ये उठता है…

जब IAS अधिकारी दशकों की सेवा के बाद भी 2–5 करोड़ की संपत्ति में सीमित हैं, तब IFS अफसरों के पास यह अकूत संपत्ति कैसे? क्या ACB और EOW की नज़र सिर्फ छोटे कर्मचारियों और क्लर्कों पर ही टिकी रहेगी? क्या वन विभाग एक ‘अनटचेबल’ किला बन गया है जहाँ भ्रष्टाचार खुलकर खेल रहा है?

पारदर्शिता की दरकार

IFS अधिकारियों के लिए भी वैसी ही पारदर्शिता अनिवार्य होनी चाहिए जैसी IAS और IPS अधिकारियों ने दिखाई है। अगर उन्हें भी अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करनी पड़ी, तो शायद राज्य में भ्रष्टाचार की जड़ें थोड़ी कमज़ोर पड़ें।


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