राजस्थान में 300 करोड़ अटके, टाइगर एरिया में खनन पर उठे सवाल

जयपुर
 राजस्थान के बाघ अभयारण्यों, कॉरिडोर और इको-सेंसिटिव जोन में खनन की मंजूरी के बीच वन्यजीव संरक्षण की व्यवस्था सवालों में है। विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, 2008 से अब तक चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन कार्यालय ने एक भी 'वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन प्लान' (डब्ल्यूसीपी) को अंतिम मंजूरी नहीं दी। इस वजह से वन्यजीव विकास, हैबिटेट सुधार और वाटर होल निर्माण के लिए करीब 300 करोड़ रुपए फाइलों में अटके हैं। पर्यावरण मंजूरी देने वाले राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) ने इस बारे में वन विभाग को कई पत्र लिखे, लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला। दूसरी ओर, खदान मालिकों को एडवांस फंड जमा करने की बाध्यता से छूट दे दी गई।

आदेश वापस लिया
सिया ने 17 जुलाई 2025 को वन्यजीव संरक्षण मद की राशि अग्रिम जमा कराना अनिवार्य किया था और 3 नवंबर 2025 को नया कार्यालय आदेश (संख्या 1361) जारी कर यह आदेश वापस ले लिया। अब कंपनियों को सरकार को एडवांस पैसा नहीं देना है। उन्हें सिर्फ 'पर्यावरण प्रबंधन योजना' में लिखकर देना है कि वन्यजीवों के लिए बजट रखा गया है। प्रोजेक्ट को मंजूरी न मिलने पर कंपनी पर पैसा खर्च करने की बाध्यता नहीं रहती और कंपनियां इसी का फायदा उठाती हैं।

चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन केसी अरुण प्रसाद ने कहा, हम इन सभी कंजर्वेशन प्लान्स को रिवाइज कर रहे हैं। इनमें जरूरी संशोधन ला रहे हैं, ताकि प्रक्रिया पारदर्शी और व्यावहारिक बन सके।

टाइगर टेरिटरी-इको-सेंसिटिव जोन में अनुमति
जिला स्तरीय कमेटियों (डीईआईएए) ने शुरुआत में इको-सेंसिटिव जोन और टाइगर टेरिटरी के दायरे में 50 से 60 माइनिंग प्रोजेक्ट्स को खनन की अनुमति दे दी थी। सिया ने बाद में इन फाइलों की पुनर्समीक्षा की, तब यह चूक पकड़ में आई। सूत्रों के अनुसार, अब भी करीब 500 खदानें बिना उचित अनुमति के चल रही हैं।

ग्राउंड स्टडी की जगह रेडीमेड रिपोर्ट
राजस्थान में किसी भी खनन या प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय मंजूरी से पहले केंद्र के पोर्टल से टीओआर जारी होता है। इसकी अहम शर्त है कि प्रोजेक्ट के 10 किमी दायरे में वन्यजीवों का अध्ययन कराया जाए, जिसे संबंधित डीएफओ सत्यापित करता है। इसके बाद कंजर्वेशन प्लान बनता है, जिसे चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन से मंजूर कराना होता है। मंजूरी के बाद ही कंपनी को अधिकतम राशि जमा करनी होती है।

अधिकांश मामलों में ग्राउंड रिपोर्ट के बजाय कंसल्टेंट से तैयार रिपोर्ट ली जाती है। कागजात के मुताबिक, फाइलें डीएफओ स्तर पर सत्यापन के लिए जाती हैं और वहीं अटक जाती हैं। मुख्यालय स्तर पर कोई फॉलो-अप नहीं होता। कुछ अधिकारियों के अनुसार, सीमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी कंपनियां अपने प्रभाव से काम जल्दी करा लेती हैं, जबकि छोटे खननकर्ताओं के प्लान पास नहीं होते।

Recent Post

Live Cricket Update

You May Like This

error: Content is protected !!

4th piller को सपोर्ट करने के लिए आप Gpay - 7587428786