वंदे मातरम् से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक कांग्रेस ने उठाए इतिहास के पन्ने, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जिन्ना, RSS और तिरंगे को लेकर भाजपा से किए तीखे सवाल
नई दिल्ली | फोर्थ पिलर न्यूज़ नेटवर्क
देश की आजादी के आंदोलन, राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े इतिहास को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कथित बयान के जवाब में कांग्रेसनेत्री सुप्रिया श्रीनेत की ओर से बेहद तीखा पलटवार किया गया है।
कांग्रेसनेत्री सुप्रिया श्रीनेत की ओर से जारी बयान में महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, पंडित जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, आचार्य जे.बी. कृपलानी, मौलाना अबुल कलाम आजाद और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख चेहरों का उल्लेख करते हुए भाजपा से सवाल किया गया कि आखिर किस आधार पर इन नेताओं के राष्ट्रवाद पर सवाल उठाए जा सकते हैं?
कांग्रेसनेत्री सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि “राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर सरदार पटेल, पंडित नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे लोगों को देशविरोधी कहने की न आपकी हिम्मत है और न हैसियत।”
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ऊपर दिए गए शब्द कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत के राजनीतिक बयान का हिस्सा हैं और इन्हें किसी न्यायिक या ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
वंदे मातरम् विवाद पर कांग्रेस ने याद दिलाया 1937 का फैसला
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने अपने बयान में 28 अक्टूबर 1937 के कांग्रेस वर्किंग कमेटी के फैसले का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह के बाद वंदे मातरम् के शुरुआती दो अंतरों को स्वीकार किया गया था और इसी रूप में इसका इस्तेमाल राष्ट्रीय आंदोलन में किया गया।
यहां ऐतिहासिक संदर्भ महत्वपूर्ण है। 1937 में कांग्रेस के भीतर वंदे मातरम् को लेकर चर्चा हुई थी। इसके बाद इसके शुरुआती दो अंतरों को सार्वजनिक और राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए उपयुक्त माना गया। इसके पीछे यह विचार था कि गीत के शुरुआती हिस्से को सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि इस निर्णय के पीछे गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष चंद्र बोस, आचार्य कृपलानी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे राष्ट्रीय नेताओं की भूमिका और सहमति थी।
उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि “हम गांधी जी, नेहरू जी, सरदार पटेल और सुभाष चंद्र बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की परंपरा को मानेंगे, अमित शाह की राजनीतिक व्याख्या को नहीं।”
“विभाजन की बात अमित शाह के मुंह से अच्छी नहीं लगती”
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने भारत विभाजन के मुद्दे पर भी भाजपा पर पलटवार किया।
उन्होंने भाजपा और उसके वैचारिक पूर्ववर्ती संगठनों की स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि आजादी की लड़ाई में योगदान को लेकर भाजपा को कांग्रेस पर सवाल उठाने से पहले अपने राजनीतिक इतिहास की भी चर्चा करनी चाहिए।
इसी क्रम में उन्होंने वीर विनायक दामोदर सावरकर से जुड़े माफीनामों और ब्रिटिश शासन से उनके संबंधों का मुद्दा उठाया।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है—सावरकर द्वारा ब्रिटिश सरकार को दया/रिहाई के लिए लिखे गए पत्र ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें लेकर राजनीतिक दलों की व्याख्याएं अलग-अलग हैं। इसी तरह किसी व्यक्ति के ऐतिहासिक संबंधों को सीधे आज के किसी राजनीतिक दल के वर्तमान नेताओं से जोड़ना भी एक राजनीतिक निष्कर्ष है, जिसे तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका पर सवाल

कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने अपने हमले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से जोड़ा।
उन्होंने सवाल किया कि जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने “करो या मरो” का नारा दिया और भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया, उस समय श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका क्या थी?
उन्होंने विशेष रूप से बंगाल की तत्कालीन राजनीति का उल्लेख किया और कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसी सरकार का हिस्सा थे जिसमें फजलुल हक के नेतृत्व वाली व्यवस्था में हिंदू महासभा की भागीदारी थी।
इतिहास क्या कहता है?
यहां भी तथ्य और राजनीतिक आरोप को अलग रखना जरूरी है।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में थे और फजलुल हक के नेतृत्व वाली बंगाल सरकार में वित्त मंत्री रहे थे। यह सरकार 1941 से 1943 के बीच विभिन्न राजनीतिक समूहों के समर्थन से चली।
मुखर्जी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों और कांग्रेस के आंदोलन के प्रति अलग राजनीतिक रुख अपनाया था। उन्होंने बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के संदर्भ में अपनी भूमिका निभाई।
इसी ऐतिहासिक तथ्य को कांग्रेस आज भाजपा की राष्ट्रवादी राजनीति पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रही है।
फजलुल हक और लाहौर प्रस्ताव का भी जिक्र
कांग्रेस नेता ने फजलुल हक का उल्लेख करते हुए कहा कि वही फजलुल हक 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग के उस प्रस्ताव को पेश करने वालों में प्रमुख थे, जिसे बाद में पाकिस्तान के निर्माण की मांग से जोड़कर देखा गया।
इतिहास में 23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में प्रस्ताव पारित हुआ था। ए.के. फजलुल हक ने यह प्रस्ताव पेश किया था।
हालांकि इसे उस समय सीधे “पाकिस्तान प्रस्ताव” नहीं कहा गया था। बाद में यही प्रस्ताव पाकिस्तान की मांग के ऐतिहासिक आधार के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
इसलिए कांग्रेस नेता का यह सवाल मूलतः भाजपा के पुराने राजनीतिक संबंधों और तत्कालीन गठबंधन राजनीति की ओर इशारा करता है।
जिन्ना की कब्र से लेकर लाहौर यात्रा तक भाजपा से पलटवार
कांग्रेस नेता ने अपने बयान में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की पाकिस्तान से जुड़ी यात्राओं का भी उल्लेख किया।

उन्होंने सवाल उठाया—
“नरेंद्र मोदी लाहौर क्यों गए थे? अटल बिहारी वाजपेयी वाघा बॉर्डर क्यों गए थे? लालकृष्ण आडवाणी जिन्ना की कब्र पर क्यों गए थे?”
यहां ऐतिहासिक रूप से यह तथ्य है कि:
- प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 1999 में लाहौर गए थे और भारत-पाकिस्तान संबंध सुधारने की पहल की थी।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिसंबर 2015 में अचानक लाहौर पहुंचे थे और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात की थी।
- लालकृष्ण आडवाणी 2005 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर गए थे और जिन्ना के 11 अगस्त 1947 के भाषण की प्रशंसा की थी। इस बयान के बाद भारत में भाजपा के भीतर भी तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई थी।
कांग्रेस अब इन्हीं घटनाओं का इस्तेमाल भाजपा की पाकिस्तान और राष्ट्रवाद संबंधी राजनीति पर सवाल उठाने के लिए कर रही है।
तिरंगे को लेकर RSS पर कांग्रेस का हमला
कांग्रेस नेता ने RSS पर तिरंगे के प्रति ऐतिहासिक रूप से असम्मानजनक रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि संगठन ने लंबे समय तक राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने दावा किया कि RSS ने 53 वर्षों तक तिरंगा नहीं फहराया।
यह दावा लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। RSS की ओर से भी समय-समय पर कहा गया है कि संगठन के नागपुर मुख्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की घटनाएं पहले भी हुई थीं। इसलिए “53 साल तक कहीं भी तिरंगा नहीं फहराया” जैसे व्यापक दावे को बिना संदर्भ के तथ्य के रूप में लिखना उचित नहीं होगा।
हाँ, यह ऐतिहासिक रूप से विवाद का विषय रहा है कि RSS ने लंबे समय तक भगवा ध्वज को अपना संगठनात्मक ध्वज माना और राष्ट्रीय ध्वज के संबंध में उसका रुख क्या था।
संविधान की प्रतियां जलाने का आरोप भी उठा
कांग्रेस नेता ने RSS और उसके वैचारिक परिवार पर संविधान की प्रतियां जलाने का आरोप भी लगाया।
यह एक गंभीर ऐतिहासिक आरोप है और इसे किसी विशिष्ट घटना, संगठन तथा दस्तावेजी प्रमाण के साथ ही तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। अलग-अलग दौर में संविधान और संवैधानिक प्रावधानों के विरोध में प्रदर्शनों की घटनाएं हुई हैं, लेकिन हर ऐसी घटना को RSS या भाजपा से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
इसलिए कांग्रेस के इस आरोप की स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि आवश्यक है।
गांधी हत्या और RSS पर प्रतिबंध का इतिहास फिर बहस में

कांग्रेस नेता ने महात्मा गांधी की हत्या के संदर्भ में भी RSS की भूमिका पर सवाल उठाए।
यहां इतिहास का एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने की थी। हत्या के बाद तत्कालीन सरकार ने RSS पर प्रतिबंध लगाया था।
हालांकि, यह कहना कि RSS को न्यायिक रूप से गांधी हत्या का दोषी ठहराया गया था, सही नहीं होगा। गांधी हत्या मामले में गोडसे और अन्य आरोपियों पर मुकदमा चला, लेकिन RSS संगठन को गांधी हत्या के लिए न्यायालय द्वारा दोषी नहीं ठहराया गया।
बाद में RSS पर लगाया गया प्रतिबंध हटाया गया।
इसलिए इस पूरे मुद्दे पर राजनीतिक आरोप और न्यायिक इतिहास के बीच अंतर करना जरूरी है।
“आज आपको छात्रों पर पैलेट गन का भी जवाब देना होगा”
कांग्रेस नेता ने अपने बयान के अंत में मौजूदा राजनीतिक मुद्दों की ओर रुख करते हुए भाजपा से सवाल किया—
“छात्रों पर पैलेट गन किसने चलवाई? क्या आपको पता था या नहीं पता था?”
यह सवाल किस विशिष्ट घटना या राज्य की कार्रवाई के संदर्भ में पूछा गया है, इसका स्पष्ट उल्लेख बयान में नहीं है। इसलिए इस आरोप को किसी खास घटना से जोड़ने से पहले संबंधित घटना और आधिकारिक रिकॉर्ड की पुष्टि आवश्यक होगी।
कांग्रेस का सीधा संदेश—आजादी के इतिहास पर राजनीतिक अधिकार किसका?
पूरे बयान का केंद्रीय संदेश यही है कि कांग्रेस भाजपा द्वारा राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीतिक व्याख्या पर सवाल उठा रही है।
कांग्रेस नेता का कहना है कि आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना आजाद और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं की भूमिका निर्विवाद रूप से भारतीय इतिहास का हिस्सा है और उनके राष्ट्रवाद पर सवाल उठाना राजनीतिक रूप से स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
दूसरी ओर भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर यह आरोप लगाती रही है कि उसने स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रवाद के इतिहास को अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप प्रस्तुत किया।
यानी विवाद केवल किसी एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत पर राजनीतिक दावे की लड़ाई बन चुका है।
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के उपरोक्त ब्यान को सोसल मिडिया में देखा जा सकता है जिसे देखने निचे लिंक पर क्लिक करें।
https://youtube.com/shorts/5cq3UawSEbM?si=IhmeJdfItfFgiaks
फोर्थ पिलर का संपादकीय सवाल
भारत में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास किसी एक पार्टी, संगठन या विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं है।
गांधी, पटेल, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना आजाद, टैगोर और हजारों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस दौर में संघर्ष किया, वह आज पूरे देश की साझा ऐतिहासिक विरासत है।
इसी तरह RSS, हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग, कांग्रेस और अन्य संगठनों की स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भूमिका का मूल्यांकन भी भावनात्मक नारों के बजाय ऐतिहासिक दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड और प्रमाणित शोध के आधार पर होना चाहिए।
राजनीतिक दलों को इतिहास से सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन इतिहास को अपनी सुविधा के मुताबिक प्रस्तुत करना जनता के साथ न्याय नहीं होगा।
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि इतिहास में कौन आज की भाजपा या कांग्रेस के पक्ष में था। सवाल यह होना चाहिए कि उस समय किसने क्या किया, क्यों किया और उसके प्रमाणित ऐतिहासिक दस्तावेज क्या कहते हैं।
यही लोकतांत्रिक इतिहास-बोध की सबसे जरूरी कसौटी है।
मुख्य बिंदु
- वंदे मातरम् के शुरुआती दो अंतरों को लेकर 1937 में कांग्रेस में महत्वपूर्ण निर्णय हुआ।
- श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल की फजलुल हक सरकार में मंत्री रहे थे।
- फजलुल हक ने 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग का ऐतिहासिक प्रस्ताव पेश किया था।
- अटल बिहारी वाजपेयी 1999 में लाहौर गए थे।
- नरेंद्र मोदी दिसंबर 2015 में लाहौर गए थे।
- लालकृष्ण आडवाणी ने 2005 में जिन्ना की मजार पर जाकर उनके 11 अगस्त 1947 के भाषण की प्रशंसा की थी।
- महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में RSS पर प्रतिबंध लगाया गया था, जिसे बाद में हटाया गया।
- RSS को गांधी हत्या के लिए किसी न्यायालय ने संगठन के रूप में दोषी नहीं ठहराया।
- तिरंगे और RSS के ऐतिहासिक रुख को लेकर लंबे समय से राजनीतिक विवाद रहा है।
- संविधान जलाने तथा अन्य गंभीर आरोपों को संबंधित प्रमाणों के आधार पर ही अंतिम तथ्य माना जाना चाहिए।
— शेख करीम
प्रधान संपादक
फोर्थ पिलर न्यूज़ नेटवर्क | 4thPiller.com









