15 अगस्त पर क्यों नहीं गाया जाता था पूरा ‘वंदे मातरम’? अब नए कानून से बदलेगा नियम, जानें विवाद की जड़

नई दिल्ली

भारत देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस बार कुछ खास होने जा रहा है. 15 अगस्त के दिन देश की राजधानी दिल्ली के लालकिले की प्राचीर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार 13वें साल तिरंगा झंडा फहराएंगे. फिर वह देश के नाम अपना संबोधन देंगे. इस दौरान तमाम सांस्कृतिक उत्सव भी होंगे. अभी तक आपने जो भी पढ़ा उसमें कुछ अलग नहीं है, बल्कि खास तो यह है कि इस स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार ‘वंदे मातरम’ को गाया जाएगा. जी हां, अभी तक राष्ट्रीय गीत को कभी भी इस समारोह में नहीं गाया गया है. आखिर अभी तक ऐसा क्यों था? आजादी से पहले ऐसा क्या हुआ था कि वंदेमातरम को लेकर विवाद था? इसके साथ ही अब किस नियम में बदलाव के तहत शामिल क्या गया है?

लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस के आयोजन को लेकर रक्षा मंत्रालय की तरफ से प्राप्त जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण से पहले लाल किले की प्राचीर से देश का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा. आजादी के जश्न के इतिहास में यह पहली बार होगा जब लाल किले पर मुख्य समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम’ गूंजेगा. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अब तक इसे स्वतंत्रता दिवस के मुख्य कार्यक्रम में शामिल क्यों नहीं किया जाता था और इसके पीछे क्या वजह रही है?

अब तक क्यों नहीं गाया जाता था?
राष्ट्रीय प्रोटोकॉल और नियम के मुताबिक अब तक लाल किले पर होने वाले आधिकारिक ध्वजारोहण समारोह में सिर्फ राष्ट्रगान यानी ‘जन गण मन’ को ही प्राथमिकता दी जाती थी. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि साल 1937 में ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंदों को ही रखने का फैसला इसलिए लिया गया था ताकि देश की विविधता को ध्यान में रखते हुए किसी भी तरह के धार्मिक विवाद से बचा जा सके। 

क्यों छोटा किया गया था वंदे मातरम?
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के लिखे गए इस प्रसिद्ध गीत के शुरुआती दो छंद तो मातृभूमि की वंदना करते हैं लेकिन इसके बाद के छंदों में देवी दुर्गा और हिंदू देवियों से जुड़े संदर्भ और प्रतीक नजर आते हैं. इसको लेकर मुस्लिम लीग और अन्य संबंधित पक्षों की तरफ से इन धार्मिक संदर्भों पर आपत्ति जताए जाने के बाद साल 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अहम फैसला करना पड़ा. तब महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर इसके शुरुआती दो छंदों को ही सार्वजनिक मंचों पर इस्तेमाल करने का फैसला किया था। 

इसके बाद आया 1947 और देश की आजादी का साल. जब भारत गणतंत्र बना, तब 1950 में संविधान सभा ने ‘जन गण मन’ को आधिकारिक राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ के पहले 2 छंदों को राष्ट्रीय गीत घोषित किया. दोनों को बराबर सम्मान दिया गया, ताकि सरकारी प्रोटोकॉल में देश की धर्मनिरपेक्षता का संतुलन बना रहे। 

अब क्या बदल रहा है?
देश में राष्ट्रीय उत्सवों की पुरानी परंपरा अब बदल रही है. इस बार स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण से ठीक पहले लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम’ की प्रस्तुति दी जाएगी. हाल ही में हुए प्रोटोकॉल बदलावों के बाद अब इस पूरे गीत को आधिकारिक राजकीय कार्यक्रमों में शामिल कर लिया गया है. राष्ट्रगान जन-गण-मन को भी इस दौरान गाया जाएगा। 

किस कानून में हुआ बदलाव? 

संसद ने पिछले महीने जुलाई में ही Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 पास कर दिया है, जिसके तहत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान के बराबर कानूनी दर्जा मिल गया. इसके साथ ही इसके गायन के दौरान जानबूझकर बाधा पैदा करने को अपमान और दंडनीय अपराध के तौर पर माना जाएगा। 

अभी तक साल 1971 में राष्ट्रगान से जुड़ा ‘प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर ऐक्ट’ आया था. इसके सेक्शन 2 और सेक्शन 3 के तहत गीत के गायन के दौरान अपमान करने को कानूनन अपराध घोषित किया गया. अब इसी 1971 के ऐक्ट में संशोधन करके वंदे मातरम को भी जोड़ दिया गया है। 

Recent Post

Live Cricket Update

You May Like This

error: Content is protected !!

4th piller को सपोर्ट करने के लिए आप Gpay - 7587428786