ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ाई में पक्षी बने धरती के रक्षक, जानिए कैसे बचा रहे हैं पर्यावरण

झज्जर/चंडीगढ़.

भोर की पहली किरण के साथ चहकने वाले पक्षी केवल आकाश की सुदंरता नहीं हैं, बल्कि ये धरती के वे मूक और सच्चे ''इकोसिस्टम इंजीनियर्स'' हैं, जो बिना किसी वेतन या स्वार्थ के ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ अग्रिम मोर्चे पर जंग लड़ रहे हैं।
जब ये पंख वाले संरक्षक उड़ते हैं, तो अपने साथ जीवन का बीजारोपण करते हैं, बंजर हो चुकी जमीनों को घने वनों में तब्दील कर देते हैं, कीटों से जंगलों की रक्षा करते हैं और वनस्पतियों को नया जीवनदान देते हैं।

पर्यावरणविद एवं डीएफओ सुंदर सांभरिया बताते है जब तक हम इन मूक बागवानों के आशियानों, शाखाओं और उनकी आर्द्रभूमियों को महफूज नहीं करते, तब तक ''क्लाइमेट एक्शन'' का हमारा हर संकल्प अधूरा रहेगा। दिवस विशेष की पावन वेला में इन बेजुबान संरक्षकों को बचाने का विचार ही हमारे सुरक्षित और हरे-भरे कल की असली नींव है। क्योंकि, वे सीधे तौर पर 'प्रकृति से प्रेरित' समाधानों को धरातल पर उतारते हैं।

प्राकृतिक बीजारोपण और वनों का पुनर्जीवन
जलवायु परिवर्तन से लड़ने का सबसे प्रभावी तरीका कार्बन को सोखना है, और इसमें पक्षी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसे विज्ञान में ''एंडोजूकोरी'' कहा जाता है। कार्बन सोखने वाले विशाल पेड़ों का रोपण: बड़े आकार के पक्षी (जैसे हार्नबिल या टूकेन) घने और भारी कार्बन सोखने वाले पेड़ों के फल खाते हैं। जब ये पक्षी उड़ते हैं, तो दूर-दराज के बंजर क्षेत्रों या कटे हुए जंगलों में बीजों को मल के रूप में छोड़ देते हैं। प्राकृतिक खाद और त्वरित अंकुरण: जब कोई बीज पक्षी के पाचन तंत्र से गुजरता है, तो उसके पेट के एंजाइम बीज की कठोर बाहरी परत को हल्का कर देते हैं। इससे वह बीज सामान्य से अधिक तेजी से अंकुरित होता है। साथ ही, पक्षियों की बीट प्राकृतिक नाइट्रोजन युक्त खाद का काम करती है, जिससे पौधों को शुरुआती पोषण मिलता है। वनस्पतियों का जीवन चक्र: पक्षियों द्वारा होने वाले परागण को विज्ञान की भाषा में ''आर्निथोफिली'' कहा जाता है।

जैव विविधता का संरक्षण:
हमिंगबर्ड, सनबर्ड और हनीईटर जैसे पक्षी जब फूलों का रस चूसते हैं, तो परागकण उनकी चोंच और पंखों पर चिपक जाते हैं। आंकड़ों के अनुसार विश्व की लगभग 15% से 25% जंगली पौधों की प्रजातियां पूरी तरह से पक्षियों द्वारा होने वाले परागण पर निर्भर हैं। यदि ये पक्षी न हों, तो जलवायु परिवर्तन के इस दौर में कई दुर्लभ औषधीय और जंगली वनस्पतियां हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएंगी। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ने से हानिकारक कीड़ों और महामारियों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। पक्षी इस संतुलन को बनाए रखने के लिए प्राकृतिक रक्षक का कार्य करते हैं।

लाखों टन कीड़ों का खात्मा:

दुनिया भर के कीटभक्षी पक्षी (जैसे स्वैलो, ब्लू बर्ड और गौरैया) मिलकर हर साल 40 से 50 करोड़ टन कीड़े खाते हैं। वनों और फसलों की सुरक्षा: पक्षी पेड़ों की पत्तियों को चट करने वाले कैटरपिलर और टिड्डियों को खाकर वनों को नष्ट होने से बचाते हैं। यदि पक्षी इन कीड़ों को न खाएं, तो घने जंगल समय से पहले ही सूख जाएंगे, जिससे पृथ्वी की कार्बन सोखने की क्षमता आधी रह जाएगी।

संक्रमण और ग्रीनहाउस गैसों पर लगाम:

मृत जीवों के अवशेषों को खाकर ये पक्षी पर्यावरण में रैबीज, एन्थ्रेक्स जैसी जानलेवा बीमारियों को फैलने से रोकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मृत जानवर खुले में सड़ते हैं, तो उनसे बड़ी मात्रा में मीथेन और अन्य हानिकारक गैसें निकलती हैं, लेकिन ये पक्षी उन्हें खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं।

जलवायु परिवर्तन के जैविक संकेतक:

पक्षी पर्यावरण में आ रहे बदलावों को सबसे पहले भांपने की क्षमता रखते हैं। तापमान में मामूली वृद्धि होने पर भी पक्षियों के प्रवास और उनके व्यवहार में तुरंत बदलाव देखा जाता है। वैज्ञानिक पक्षियों की घटती-बढ़ती आबादी को देखकर यह सटीक अनुमान लगाते हैं कि कौन सा पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में है, जिससे समय रहते ''क्लाइमेट एक्शन'' लिया जा सके।

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