बेरूत
ट्रंप अब ईरान के साथ समझौते की रणनीति पर उतर आए हैं लेकिन इजरायल लगातार अपनी जंग लड़ रहा है. मिडिल ईस्ट के कई देशों में चल रही खौफनाक बमबारी के बीच लेबनान की सेना ने हथियार डाल दिए हैं. 1 महीने लंबी लड़ाई लड़ने के बाद लेबनानी सेना दक्षिणी लेबनान के दो प्रमुख शहरों, रमीश (Rmeish) और ऐन एबेल (Ain Ebel) से अपने कदम पीछे खींचते हुए चली गई है. सेना का हटना इस बात का बड़ा संकेत है कि इजरायली डिफेंस फोर्सेस (IDF) अब मिडिल ईस्ट में अपना मकसद मजबूत करती जा रही है।
क्या लेबनान ने सच में ‘हथियार डाल दिए’ हैं?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबित लेबनान की आधिकारिक सेना हिजबुल्लाह के मुकाबले काफी कमजोर और कम संसाधनों वाली है. वो इजरायल की आधुनिक मशीनरी और एयरफोर्स का सामना करने की स्थिति में नहीं है. रमीश और ऐन एबेल जैसे शहरों से पीछे हटना इजरायल को लेबनान के भीतर घुसने का ‘खुला निमंत्रण’ देने जैसा है।
लेबनानी सेना के पीछे हटने का सीधा मतलब ये है कि नेतन्याहू का संकल्प पूरा हुआ. इजरायल लंबे समय से दक्षिण लेबनान में एक बफर जोन बनाना चाहता है ताकि हिजबुल्लाह के रॉकेट हमलों को रोका जा सके. लेबनान की सेना के हटते ही अब वहां सिर्फ हिजबुल्लाह के लड़ाके और इजरायली टैंक ही आमने-सामने होंगे।
अब तक लेबनानी सेना की मौजूदगी एक ‘बैरियर’ का काम करती थी लेकिन अब हिजबुल्लाह को अपनी रक्षा खुद करनी होगी. इजरायल के लिए अब इन इलाकों पर कब्जा करना और भी आसान हो गया है।
मिडिल ईस्ट की जंग में इसके बड़े मायने
गाजा और ईरान के बाद अब लेबनान में इजरायल को बिना लड़े ही रास्ता मिल रहा है. ये बेंजामिन नेतन्याहू के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और सैन्य जीत है. हिजबुल्लाह ईरान का सबसे बड़ा और ताकतवर प्रॉक्सी ग्रुप है. लेबनान की सरकारी सेना का पीछे हटना यह दिखाता है कि लेबनान के भीतर भी अब हिजबुल्लाह को लेकर समर्थन कम हो रहा है या वहां का प्रशासन अब और तबाही नहीं झेलना चाहता।
सेना के हटते ही इन इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों में भारी खौफ है. लोग घर छोड़कर उत्तर की ओर भाग रहे हैं, जिससे लेबनान में एक बड़ा मानवीय संकट खड़ा हो सकता है।
अगला कदम क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि लेबनानी सेना का हटना इस बात की पुष्टि है कि अगले 24 से 48 घंटों में इजरायली टैंक रमीश और ऐन एबेल की सड़कों पर नजर आ सकते हैं. इजरायल अब लेबनान के भीतर ‘क्लीन-अप ऑपरेशन’ चलाएगा ताकि हिजबुल्लाह के ठिकानों और सुरंगों को जड़ से मिटाया जा सके।
1948 से शुरू हुआ सीमाओं का विस्तार
इजरायल के नक्शे का इतिहास युद्धों की कहानियों से भरा पड़ा है. साल 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने जब विभाजन की योजना पेश की थी, तब इजरायल के लिए केवल 14,500 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र प्रस्तावित किया गया था, लेकिन 1948 में इजरायल की स्थापना के तुरंत बाद शुरू हुए पहले अरब-इजरायल युद्ध ने सब कुछ बदल दिया. इस जंग के खत्म होने तक इजरायल ने अपनी प्रस्तावित सीमाओं को तोड़ते हुए लगभग 20,700 वर्ग किलोमीटर के इलाके पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था. यहीं से इजरायल के भौगोलिक विस्तार के उस दौर की शुरुआत हुई, जिसने मध्य-पूर्व की राजनीति को हमेशा के लिए अस्थिर कर दिया।
सिक्स डे वॉर और कब्जे का सबसे बड़ा दौर
इजरायल के इतिहास में 1967 की सिक्स डे वॉर मील का पत्थर साबित हुई. इस छोटी सी लेकिन भीषण जंग में इजरायल ने अपने पड़ोसी देशों को चौंकाते हुए वेस्ट बैंक, गाजा पट्टी, गोलन हाइट्स और सिनाई प्रायद्वीप जैसे विशाल क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया. इस युद्ध के बाद इजरायल का आकार कई गुना बढ़ गया था. हालांकि बाद में शांति समझौतों के तहत सिनाई प्रायद्वीप को मिस्र को वापस लौटा दिया गया, लेकिन गोलन हाइट्स और वेस्ट बैंक जैसे इलाके आज भी विवाद और कब्जे के केंद्र में बने हुए हैं. यही वे इलाके हैं, जिनके लिए आज भी खून बह रहा है।
ईरान-इजरायल युद्ध और मौजूदा हालात
आज के दौर में जब ईरान और इजरायल के बीच सीधी जंग छिड़ी हुई है, तो जमीन का यह विवाद और भी गहरा गया है. ईरान लगातार इजरायल पर फिलिस्तीनी और अरब जमीनों पर अवैध कब्जे का आरोप लगाता रहा है. मौजूदा संघर्ष में जहां इजरायल को अमेरिका का खुला समर्थन प्राप्त है, वहीं ईरान इसे अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई बता रहा है. जानकारों का मानना है कि इजरायल द्वारा समय-समय पर अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाना ही ईरान और उसके सहयोगियों के गुस्से की सबसे बड़ी वजह है. इस युद्ध में इजरायल को कड़ी चुनौती मिल रही है, जिससे उसकी विस्तारवादी नीति पर सवाल उठने लगे हैं।
कितना बढ़ गया इजरायल का कुल क्षेत्रफल?
आंकड़ों की नजर से देखें तो इजरायल का विस्तार काफी चौंकाने वाला है. जिस देश की शुरुआत करीब 14,000 वर्ग किलोमीटर से होनी थी, उसका आधिकारिक क्षेत्रफल आज लगभग 22,072 वर्ग किलोमीटर होने का अनुमान है. इसमें गोलन हाइट्स जैसे वे इलाके भी शामिल हैं, जिन्हें इजरायल ने अंतरराष्ट्रीय विरोध के बावजूद अपने नक्शे में मिला रखा है. इजरायल का यह बदलता नक्शा न केवल क्षेत्र में उसकी सैन्य शक्ति को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि भविष्य के युद्धों के पीछे जमीन की यह पुरानी लड़ाई ही सबसे बड़ी और मुख्य जड़ है।
ग्रेटर इजरायल की विचारधारा और इसका विवाद
इजरायल के इर्द-गिर्द घूमने वाला सबसे बड़ा विवाद ग्रेटर इजरायल की विचारधारा है. यह कोई आधिकारिक सरकारी योजना नहीं है, लेकिन एक ऐसी विचारधारा है जो इजरायल के विस्तार की वकालत करती है. इस विचारधारा के समर्थक बाइबिल के आधार पर प्राचीन यहूदी राज्य की उन सीमाओं की कल्पना करते हैं जो आधुनिक इजरायल से कहीं ज्यादा बड़ी हैं. इस विचार के तहत फिलिस्तीन, लेबनान और सीरिया जैसे पड़ोसी देशों के हिस्सों को भी इजरायल के दायरे में लाने की बात की जाती है. यही वह विचारधारा है जिसे ईरान और अन्य अरब देश क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं।
मध्य-पूर्व और अमेरिका की रणनीतिक भागीदारी
इस पूरे भौगोलिक विस्तार और युद्धों के पीछे अमेरिका की भूमिका भी काफी अहम रही है. इजरायल के 1948 से लेकर आज तक के क्षेत्रीय विकास में अमेरिका ने एक मजबूत रक्षक की भूमिका निभाई है. अमेरिका की सैन्य और कूटनीतिक मदद ने ही इजरायल को अपने पड़ोसियों के साथ कई बार टकराने और अपनी सीमाओं को फैलाने का मौका दिया है. ईरान और इजरायल के इस संघर्ष में अमेरिका का सीधा दखल यह साबित करता है कि इजरायल के नक्शे में होने वाला हर छोटा-बड़ा बदलाव वैश्विक राजनीति और शांति के लिए कितना संवेदनशील विषय है।








