राकेश चतुर्वेदी और श्रीनिवास राव की कोशिशें भी नाकाम, अब वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी से थी आखिरी उम्मीद — पर दीपावली की छुट्टियों में फाइल भी गई सोने!
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रायपुर/दुर्ग | विशेष रिपोर्ट : अब्दुल शेख करीम
छत्तीसगढ़ वन विभाग के 3600 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी, जिन्होंने 1998 के बाद से अपने जीवन के दो दशक विभाग की सेवा में बिता दिए,
आज फिर से उम्मीद और अनिश्चितता के बीच झूल रहे हैं।
इन कर्मचारियों ने वर्षों पहले यह विश्वास किया था कि जैसे 1988 और 1998 के कर्मचारियों को नियमित किया गया,
वैसे ही उन्हें भी शासन एक दिन स्थायी कर देगा।
पर आज, जब दीपावली के दीप जल रहे हैं, इन कर्मचारियों के घरों में अब भी “फाइल अटकी है” का अंधेरा पसरा हुआ है।
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राकेश चतुर्वेदी ने शुरू की थी पहल, श्रीनिवास राव ने भी बढ़ाया प्रयास

पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) श्री राकेश चतुर्वेदी ने इन कर्मचारियों के लिए नियमितीकरण की फाइल तैयार कर,
वन विभाग से उसका प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजने तक का मार्ग प्रशस्त किया था।
उनके सेवानिवृत्त होने के बाद, वर्तमान PCCF श्री श्रीनिवास राव ने भी इस विषय को गंभीरता से लेते हुए
सभी प्रशासनिक अड़चनों के बावजूद फाइल को वित्त विभाग तक पहुंचाने में अथक मेहनत की।
इन दोनों वरिष्ठ IFS अधिकारियों की ईमानदार कोशिशों ने कर्मचारियों में नई ऊर्जा जगाई थी —
लेकिन अब वही फाइल वित्त विभाग में जाकर रुक गई है।
कर्मचारियों का कहना है कि —
> “हमने सुना था कि अबकी बार दीपावली से पहले हमें खुशखबरी मिलेगी, पर अफसोस, दीपावली आ गई पर हमारी फाइल अब भी वहीं है।”
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फाइल वित्त विभाग में अटकी — अफवाहों और निराशा का दौर शुरू

सूत्रों के अनुसार, यह फाइल कई सप्ताहों से वित्त मंत्री श्री ओ.पी. चौधरी के विभाग में लंबित है।
अब जब दीपावली का त्यौहार शुरू हो गया है और सरकारी दफ्तरों में लंबी छुट्टियाँ घोषित हैं,
तो इस फाइल पर कोई नई कार्यवाही होना लगभग असंभव लगता है।
कर्मचारियों में यह भी चर्चा है कि —
> “अब जब त्योहार बीत जाएगा, तब भी नेतागण महीनों तक दीपावली मिलन समारोहों में व्यस्त रहेंगे,
ऐसे में हमारी फाइल फिर कब खुलेगी, यह कोई नहीं जानता।”
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‘सर्वेसरवा’ वित्त मंत्री से थी उम्मीद — पर अब उम्मीद धुंधली
वन विभाग के इन 3600 कर्मचारियों को राज्य के “सर्वेसरवा” कहे जाने वाले
वित्त विभाग के मुखिया श्री ओ.पी. चौधरी से बड़ी उम्मीदें थीं।
कर्मचारियों को विश्वास था कि वे दीपावली से पूर्व इस प्रस्ताव को मंजूरी देकर
हजारों परिवारों को सबसे बड़ा तोहफा देंगे।
पर अब जब दीपावली का त्यौहार शुरू हो चुका है और छुट्टियों का दौर भी,
तो फाइल के आगे बढ़ने की संभावना बेहद कम दिख रही है।
एक कर्मचारी ने कहा —
> “अब लगता है हमारी फाइल भी छुट्टी पर चली गई है…
शायद अगले साल किसी नए चुनावी वादे के साथ ही फिर बात बने।”
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राजनीति का कड़वा सच — वादे चुनाव तक, हकीकत चुनाव बाद गायब
कर्मचारी अब यह महसूस कर रहे हैं कि राजनीति ने उनके विश्वास को बार-बार तोड़ा है।
कई बार नेता यह आश्वासन देते हैं कि “चुनाव के बाद आपकी नियमितीकरण की घोषणा होगी”,
पर सरकार और मंत्री बनते ही वही वादे हवा में उड़ जाते हैं।
एक वरिष्ठ कर्मचारी ने कहा —
> “हमने अपने जीवन के 20–25 साल वन विभाग को दिए,
अब उम्र बीत चुकी है, न नई नौकरी कर सकते हैं, न पुरानी छोड़ सकते हैं…
हम तो बस उम्मीद के सहारे जी रहे हैं।”
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‘चाय-पानी’ और ‘चंदा-बोडी’ की अफवाहें जारी
फाइल अटकने के कारण अफसरशाही पर भी सवाल उठने लगे हैं।
कई कर्मचारी आपस में कहते हैं कि “कहीं आर्थिक स्वीकृति या चढ़ावे की कमी” कारण तो नहीं?
हालांकि, इसकी कोई पुष्टि नहीं है, परंतु ऐसी चर्चाएँ अब सामान्य हो चली हैं।
इसी बीच कुछ तथाकथित कर्मचारी नेता “ऊपर तक बात पहुंचाने” के नाम पर
चंदा उगाही और बोडी वसूली में भी सक्रिय बताए जा रहे हैं।
इन हालातों ने मेहनतकश कर्मचारियों की स्थिति को और दयनीय बना दिया है।
इसी तरह का एक और मामला…. रेंजर–SDO पदोन्नति फाइल वनमंत्री बंगले में अटकी — अफसरों की उम्मीदें अधर में!
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छत्तीसगढ़ वन विभाग में 23 जून को SDO/ACF और 2 सितम्बर को रेंजरों की DPC हो चुकी है,
लेकिन पदोन्नति आदेश अब तक जारी नहीं हुए।
कर्मचारियों का कहना है —
> “फाइल महीनों से वनमंत्री केदार कश्यप जी के हस्ताक्षर की बाट जोह रही है।”

दीपावली के मौके पर जहां अधिकारी खुशियों की उम्मीद कर रहे थे,
वहीं फाइल मंत्री बंगले में ठहरी हुई है।
अब सवाल यह है कि —
क्या वनमंत्री जी इन पदोन्नति फाइलों पर हस्ताक्षर कर
वन विभाग को दीपावली का असली तोहफा देंगे?
अब देखना यह है…
क्या दीपावली के बाद वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी इस फाइल पर हस्ताक्षर कर
इन 3600 कर्मचारियों के जीवन में “वास्तविक रोशनी” लाएंगे,
या फिर यह मामला भी दीपावली मिलन समारोहों और राजनीतिक व्यस्तताओं की भीड़ में खो जाएगा?
क्योंकि यह सिर्फ़ एक फाइल नहीं —
बल्कि हजारों परिवारों की जीवनभर की तपस्या, उम्मीद और अधिकार का प्रतीक है।
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🖊️ रिपोर्ट – अब्दुल शेख करीम
(पत्रकार, RTI एवं सामाजिक कार्यकर्ता)
दुर्ग, छत्तीसगढ़









