सरकारी विज्ञापनों में ‘सौर ऊर्जा से रोशन घर’… हकीकत में उपभोक्ता बिजली दफ्तर के चक्कर लगाने को मजबूर

🚨 सौर ऊर्जा योजना में लूट और लापरवाही: उपभोक्ताओं की समस्याओं से बेखबर बिजली विभाग

सरकारी विज्ञापनों में ‘सौर ऊर्जा से रोशन घर’… हकीकत में उपभोक्ता बिजली दफ्तर के चक्कर लगाने को मजबूर

रायपुर/दुर्ग।
केंद्र और राज्य सरकार जहां सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए बड़े-बड़े विज्ञापन निकाल रही है, वहीं आम जनता को इस योजना का लाभ लेने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
केंद्र सरकार 78,000 रुपए और छत्तीसगढ़ सरकार 30,000 रुपए तक की सब्सिडी देने की बात कह रही है। अखबारों और टीवी चैनलों में इसे “अति आवश्यक कार्य” बताकर प्रचार किया जा रहा है। लेकिन असली तस्वीर यह है कि बिजली विभाग के अधिकारी उपभोक्ताओं की समस्याओं के समाधान में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।

 


अधिकारी भी अनजान, उपभोक्ता हलकान

जब संवाददाता ने बिजली कार्यालय जाकर जानकारी लेने की कोशिश की तो वहां मौजूद महिला सब-इंजीनियर ने साफ कहा—
“मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, आप उच्च अधिकारी से संपर्क करें।”
जब उच्च अधिकारी की खोज की गई तो पता चला कि वे “मीटिंग में गए” हैं।
यानी उपभोक्ता का समय और धैर्य, दोनों ही सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़ रहे हैं।


🏦 बैंक लोन में पेच, 50 साल से ऊपर वालों को राहत नहीं

सौर पैनल लगाने के लिए अधिकतर उपभोक्ता बैंक लोन लेना चाहते हैं। लेकिन बैंकों का नियम है कि 50-55 वर्ष से अधिक आयु वालों को लोन नहीं मिलेगा।
कारण—10 साल के लोन टेन्योर में उम्र का रिस्क।
यानी बुजुर्ग उपभोक्ता न नगद पैनल लगवा सकते हैं और न ही लोन ले सकते हैं।
उन्हें सलाह दी जा रही है कि बिजली बिल अपने बेटे-बेटी के नाम कराएं तभी लोन संभव है।

📑 नामांतरण और कागजों का झंझट

यहीं से उपभोक्ता की असली मुसीबत शुरू होती है।

कई मामलों में बिजली बिल स्वर्गीय माता-पिता के नाम से आता है।

नाम बदलवाने के लिए विभाग जमीन का कागजात, आधार, फोटो और कई जटिल दस्तावेज मांग रहा है।

जिन परिवारों में संपत्ति का बंटवारा नहीं हुआ है या पिता अभी जीवित हैं पर लिखित देने को तैयार नहीं हैं, वहां नामांतरण संभव नहीं।


ऐसे में उपभोक्ता सौर पैनल लगाने का अधिकार खो बैठते हैं।


😡 उपभोक्ता उग्र, पर अधिकारी बेफिक्र

बिजली कार्यालय पहुंचे उपभोक्ता समस्याओं से परेशान होकर बड़बड़ाते हुए लौटते नजर आए।
लोग उग्र थे, लेकिन महिला अधिकारी की मौजूदगी में चुपचाप वापस लौट गए।
जनता का कहना है—
“विज्ञापनों में तो फायदे ही फायदे बताए जाते हैं, लेकिन हकीकत में हमारी परेशानियों को सुनने वाला कोई नहीं।”

🕵 टेबल के नीचे का खेल शुरू?

स्थिति यह बन रही है कि जिन कागजों की कमी है, उन्हें सही कराने या नाम सुधारने के लिए उपभोक्ताओं को ‘टेबल के नीचे खेल’ का सहारा लेना पड़ रहा है।
यानी योजना का फायदा लेने की बजाय आम आदमी भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के जाल में फंसता जा रहा है।

सवाल यह उठता है…

क्या शासन सिर्फ विज्ञापनबाजी कर रहा है?

क्या विभागीय अधिकारी जानबूझकर उपभोक्ताओं को परेशान कर रहे हैं ताकि अवैध वसूली का रास्ता खुले?

क्या आम जनता के लिए वाकई सौर ऊर्जा योजना एक ‘सुलभ विकल्प’ है या सिर्फ कागजों में दिखावा?

 

👉 निष्कर्ष:
सौर ऊर्जा योजना की असली तस्वीर बहुत भयावह है।
जहां एक ओर शासन इसे जनता का अधिकार बताकर प्रचारित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ता की समस्याओं को सुनने और समाधान करने के लिए कोई भी जिम्मेदार अधिकारी सामने नहीं आ रहा है।
इस लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण आम जनता अब सरकार की इस योजना पर सवाल उठाने लगी है।

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