मुंबई
महाराष्ट्र एक तरफ जहां 10 दिवसीय गणेशोत्सव के रंग में रंगा हुआ है और गणपति की भक्ति में डूबा हुआ है, उसी बीच मराठों को आरक्षण दिलाने के लिए लंबे समय से लड़ाई लड़ रहे मराठा कार्यकर्ता मनोज जरांगे पाटिल ने मुंबई के आजाद मैदान में अपना अनशन शुरू कर दिया है। वे राज्य में देवेंद्र फडणवीस की अगुवाई वाली महायुति सरकार से मराठों के लिए आरक्षण का अपना वादा पूरा करने की मांग कर रहे हैं। जरांगे ने पिछले साल भी मुंबई में मार्च किया था, तब एकनाथ शिंदे सरकार ने उन्हें मराठों को आरक्षण देने का भरोसा दिलाकर मना लिया था।
हालाँकि, मनोज जरांगे और मराठा आंदोलनकारियों को सरकार ने कुछ शर्तों के साथ आजाद मैदान में सिर्फ एक दिन के लिए विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति दी है,लेकिन जरांगे ने अनिश्चितकालीन अनशन का ऐलान किया है। लिहाजा, सरकार और आंदोलनकारियों के बीच टकराव की संभावना बढ़ गई है। त्योहारों के मौसम में मराठों के प्रदर्शन ने मुंबई पुलिस की भी चिंता बढ़ा दी है। इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब शुक्रवार के विरोध प्रदर्शन के लिए आजाद मैदान पहुंच रहे मराठों की वजह से शहर की सड़कें जाम हो गईं और लोगों को अपने-अपने दफ्तर जाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हालांकि, व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए मंबई पुलिस ने 1,500 कर्मियों को तैनात किया था लेकिन वे नाकाफी साबित हुए।
भाजपा की क्या चिंता?
अब बात भाजपा की टेंशन की। पहली चिंता तो गणेशोत्सव के दौरान मंबई में मराठों के अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की वजह से टकराव से जुड़ी है। दूसरी, मराठा आंदोलनकारी अब धीरे-धीरे महायुति सरकार पर हमलावर हो रहे हैं। करीब नौ महीने तक शांत रहने के बाद जरांगे पाटिल ने अब अपनी बयानबाजी तेज कर दी है। उन्होंने भाजपा के नेतृत्व वाली फडणवीस सरकार पर "मराठा समुदाय को मूर्ख" बनाने का आरोप लगाया और दावा किया कि अगर उन्हें "गोलियों का सामना" करना पड़ा, तब भी वह पीछे नहीं हटेंगे।
विधानसभा चुनाव से पहले लड़ाई कर दी थी शिथिल
बड़ी बात यह है कि 9 महीने पहले इन्हें मराठों ने विधानसभा चुनाव से ऐन पहले अपनी लड़ाई कम कर दी थी। उस समय सीएम एकनाथ शिंदे, जो खुद एक मराठा हैं, आगे बढ़ते हुए जरांगे को समझाने और शांत कराने में कामयाब रहे थे लेकिन इस बार वही शिंदे इस लड़ाई से दूर बने हुए हैं। भाजपा को इस बात की भी चिंता है कि उसके सहयोगी किनारे क्यों हैं। शिंदे ने यह कदम तब उठाया था, जब लोकसभा चुनावों में मराठा आंदोलन का भारी असर देखने को मिला था।
लोकसभा चुनावों में मराठों के विरोध का खामियाजा
2024 के लोकसभा चुनावों में जरांगे पाटिल द्वारा मराठों से भाजपा का बहिष्कार करने का आह्वान कारगर रहा था। यही कारण बना कि सत्तारूढ़ भाजपा 28 संसदीय सीटों पर चुनाव लड़कर केवल 9 पर ही जीत सकी। जबकि उनके सहयोगी दल 20 सीटों पर लड़कर 8 सीट जीत सके। हालाँकि, विधानसभा चुनावों से पहले, भाजपा और उसके गठबंधन ने उन ओबीसी समुदायों को एकजुट करने पर ध्यान केंद्रित किया, जो कुनबी (सबसे बड़े ओबीसी समूहों में से एक जो अलग से ओबीसी आरक्षण की मांग कर रहा है) के लिए आवंटित मराठों को आरक्षण का लाभ देने का विरोध कर रहे हैं। इस रणनीति का चुनावों में अच्छा परिणाम मिला और पार्टी 148 सीटों पर चुनाव लड़कर 132 सीटें जीतकर सत्ता में वापस आ गई।
स्थानीय निकाय चुनावों से पहले फिर आंदोलन
स्थानीय चुनावों से पहले फिर से शुरू किए गए आंदोलन के बीच इस बार फिर से ओबीसी, जरांगे पाटिल के आरक्षण के विरोध में कमर कस रहे हैं। महाराष्ट्र ओबीसी महासंघ के अध्यक्ष बबनराव तायवाड़े ने दीर्घकालिक रणनीति बनाने के लिए शुक्रवार को नागपुर में एक बैठक बुलाई है। महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अनुसार, ओबीसी राज्य की कुल आबादी का लगभग 38% हिस्सा हैं। तायवाड़े ने कहा, “ओबीसी एक बड़ी ताकत हैं और अगर कोई भी इससे छेड़छाड़ करने की कोशिश करता है, तो हम सड़क पर उतरकर आंदोलन के जरिए उसका मुकाबला करेंगे। हम मराठा आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे ओबीसी कोटे से ऊपर और ऊपर होना चाहिए।”
MVA सियासी लाभ के फेर में
दूसरी तरफ, जारंगे पाटिल के विरोध प्रदर्शन से सियासी लाभ की उम्मीद कर रही कांग्रेस, शरद पवार की NCP और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) गठबंधन ने उनका समर्थन किया है। इंडियन एक्सप्रेस से कांग्रेस नेता बालासाहेब थोराट ने कहा, "मैं जारंगे पाटिल के आंदोलन की सफलता के लिए प्रार्थना करता हूँ ताकि मराठों को आरक्षण मिले। साथ ही, सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ओबीसी कोटा बरकरार रहे।"